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5 आदतें जो आपके स्वास्थ्य को बेहतर बना देंगे || Health tips in hindi

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                              www.frontknowledge.blogspot.com       स्वस्थ जीवन का मतलब होता है, अच्छा स्वास्थ्य और समझदार दिमाग।  यदि आप शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से फिट रहना चाहते हैं, तो आपको हर दिन अच्छी आदतों का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। आपको वही करना चाहिए जो आपके दिमाग और आपके शरीर के लिए सही हो।   अपनी जीवनशैली और आदतों का ध्यान रखना आपको अपने बारे में अच्छा महसूस कराता है।  यह आपके आत्म-सम्मान और आत्म-छवि को बढ़ाता है।  हर किसी के लिए स्वस्थ जीवन जीना महत्वपूर्ण है।  धूम्रपान, मादक द्रव्यों के सेवन और शराब के सेवन जैसी बुरी आदतों का शिकार नहीं होना चाहिए।  ये आदतें आपके स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं, और यदि एक बार जब आप आदी हो जाते हैं, तो इससे कोई वापसी नहीं होती है।  स्वस्थ रहने के बहुत सारे तरीके हैं।  एक स्वस्थ जीवन शैली बीमारियों को रोकती है और आपको पुरानी बीमारियों से दूर रखती है।  अच्छी आदतें आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाती हैं और आपको फिट रहने में मदद करती हैं।  एक व्यक्ति का संपूर्ण स्वास्थ्य और कल्याण इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपना जीवन कैसे ज

शहद एक संजीवनी

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                           www.frontknowledge.blogspot.com                  शहद प्रकृतिप्रदत्त एक चमत्कारी उपहार है, जिसकी उत्पत्ति सूर्य की रोशनी, फूल के पराग एवं सुगंध की रासायनिक क्रियाओं से होती है। इसका निर्माण करने वाली मधुमक्खियाँ परमार्थभाव एवं आपसी सहकार से इसे बनाती, पकाती एवं मनुष्य को प्रदान करती हैं।  यह समस्त विटामिनों के साथ सत्तर तत्त्वों के संगठन से उत्पादित मिश्रण है, जिसमें पोषक क्षमता तो अद्भुत है ही, साथ ही औषधियुक्त गुण भी हैं। ये किसी भी परिस्थिति में नष्ट नहीं होते। शहद में फुरती बढ़ाने, पेट को संतुलित रखने, पाचनतंत्र को सुव्यवस्थित बनाने, स्मरण शक्ति को विकसित करने एवं बुद्धि विकास के साथ प्रत्युत्पन्नमति मेधा विकसित करने की अद्भुत क्षमता है।  एक शब्द में इसे संजीवनी बूटी एवं अमृत कहा जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। सरदी के दिनों में शरीर को गरम बनाए रखने एवं सरदी जुकाम से बचाए रखने में लोग बादाम को शहद में मिलाकर लिया करते थे एवं शक्तिवर्द्धक टॉनिक के रूप में इसका उपयोग करते थे। प्राचीनकाल के अधिकांश लोग शारीरिक गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए शहद का ही प्

माता के आभूषण

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                                   www.frontknowledge.blogspot.com उन्नीसवीं शताब्दी अपनी अंतिम साँसें गिन रही थी और गिन रहा था अपने जीवन के आखिरी साल एक वयोवृद्ध बंगाली । नाम था उसका ठाकुरदास और परिवार में केवल एक बच्चा तथा पत्नी थे। इस सीमित परिवार का भरण-पोषण भी ठीक प्रकार से न हो पाता था। ठाकुरदास दो रुपये माहवार की नौकरी करते थे और उसी से अपने परिवार का गुजारा तथा लड़के का खरच चलाते थे।  पहले तो ठाकुरदास को कलकत्ता की गलियों और सड़कों पर भटकना पड़ा। कभी भोजन का प्रबंध हो जाता था, कभी दोनों वक्त का और कभी-कभी एक ही वक्त का ऐसे भी कई अवसर आए थे जबकि घर में किसी के मुँह में एक रोटी तो दूर एक दाना भी नहीं पहुँच पाया। माँ व्यथित, पिता परेशान और पुत्र का भविष्य अनिश्चित।  आशा की एक ही किरण थी, कभी तो भगवान सुनेगा और अभी वह किरण उदित होने का समय नहीं आया था शायद। लेकिन फिर भी बड़े धैर्य के साथ दोनों पति-पत्नी प्रतीक्षा कर रहे थे। पुत्र तो अभी समझने लायक भी नहीं था। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई तो नियति ने उन्हें मेदिनीपुर जिले के एक गाँव में ला पटका।  वहाँ ठाकुरदास को दो रुपये माहवार

संघर्ष से घबराएँ नहीं - सफलता चरण चूमेगी

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                        www.frontknowledge.blogspot.com                अमेरिका का प्रसिद्ध नगर शिकागो, सरदी के दिन, व्यस्त राजमार्ग पर भी बहुत कम चहल-पहल नजर आ रही थी। जितने अमेरिकी सड़क पर गुजरते हुए दिखाई भी देते, वे लंबा ऊनी कोट पहने और कैप लगाए थे। होटल और रेस्ट्रा खचाखच भरे थे। लोग गरम चीजें खा-पीकर अपनी ठंढ को भुलाने का प्रयास कर रहे थे।  ऐसी ठंड में एक भारतीय संन्यासी बोस्टन से आने वाली रेलगाड़ी से शिकागो स्टेशन पर उतरा । कपड़े गेरुए रंग के थे। सिर पर पगड़ी बँधी थी, जिसका रंग भी गेरुआ ही था विचित्र वेशभूषा को देखकर अनेक यात्रियों की दृष्टि उस पर जम गई। वह फाटक पर पहुँचा। लंबे चोंगे की जेब से टिकिट निकाला और टिकिट कलेक्टर को देकर वह प्लेटफार्म से बाहर आ गया।  उसे देखने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। भीड़ में से ही किसी ने पूछ लिया- 'आप कहाँ से आए हैं?' बोस्टन से, पर निवासी भारत का हूँ। यहाँ किससे मिलना है। डॉक्टर बैरोज से। 'कौन डॉक्टर बैरोज। 'संन्यासी ने अपने चोंगे की जेब में हाथ डाला पर हाथ खाली ही निकला। 'क्यों? क्या हुआ ?' 'मैं डॉक्टर बैरोज के नाम ब

महाद्वीपों एवं महासागरों की उत्पत्ति का रहस्य

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                     www.frontknowledge.blogspot.com                  महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों-भूगर्भशास्त्रियों में मतान्तर रहा है। इस सम्बन्ध में सामने आये प्रमुख सिद्धांतों का विवरण निम्नवत है:---  (संकुचन पर आधारित सिद्धान्त):--.  कई वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की उत्पत्ति ऊष्ण-तरल पदार्थों के रूप में हुई, जो धीरे-धीरे ठोस में परिवर्तित हो चुकी है या हो रही है।  इस प्रक्रिया द्वारा पृथ्वी का बाह्यतम भाग सबसे पहले ठण्डा हुआ, उसके बाद आन्तरिक भाग धीरे-धीरे ठण्डा हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप बाह्य भाग का आंतरिक भाग पर दबाव पड़ा, जिससे पृथ्वी के विभिन्न भागों में कहीं उभार तथा कहीं धंसाव की प्रक्रिया होती रही, जिसके फलस्वरूप महासागरों तथा महाद्वीपों का निर्माण हुआ।  ऊँचा भाग महाद्वीप तथा धंसा भाग महासागर (जलाच्छादित) कहलाया। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन लॉर्ड केलविन, सोलास, लेपवर्थ जैसे भू-वैज्ञानिकों ने किया। परन्तु इस परिकल्पना को मान्यता नहीं दी गयी। इसके बाद ग्रीन की चतुष्फलक परिकल्पना प्रकाश में आयी, जिसको इन्होंने 1875 में प्रस्तुत किया।  इसके

देवभाषा संस्कृत का महत्व

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                            www.frontknowledge.blogspot.com देवभाषा का दर्जा प्राप्त संस्कृत का पूरे भारतीय समाज के साथ सांस्कृतिक संबंध है। विद्वानों का मानना है कि इसका आरंभ 1500 से 1200 ई. पृ. खोजा जा सकता है। यह काल पू. ऋग्वैदिक काव्यों का काल है। दरअसल हमारे यहाँ श्रुति और स्मृति की लंबी परंपरा रही है। ऐसे में इस भाषा का उद्भव व विकास खोजना इतना आसान नहीं रहा।  वैसे वैदिक काल में वेदों के पवित्र श्लोक, मंत्र तथा ऋचाएं मिलती हैं। फिर इसी दौर में धार्मिक अनुष्ठानों, मंत्रों आदि की भी भरपूर रचना हुई। पुराण, आरण्यक, उपनिषद् आदि इसी काल की रचनाएं हैं। वैसे संस्कृत का वास्तविक इतिहास पाणिनी (5वीं सदी) के काल से माना जाता है। इसी दौरान वेदान्त की रचना हुई। पाणिनी ने तो खैर 'अष्टाध्यायी' लिखा ही।  पिंगल छंद भी इसी दौर में रचे गये। इसके बाद लौकिक संस्कृत का अभ्युदय हुआ। आख्यायिकाएं, प्रशस्तिकाव्य, वाल्मीकि का रामायण, व्यास का महाभारत इसी काल की रचनाएं मानी जाती हैं। महाभारत का काल ईसा पूर्व 1000 वर्ष माना जाता है। इसी दौरान देश के करोड़ों लोगों की प्रेरणास्त्रोत रही 'गीता'

सांसारिक उन्नति का रहस्य

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                           www.frontknowledge.blogspot.com                                   संसार में मनुष्य ने आज तक जो आश्चर्यजनक उन्नति की है और समस्त प्राणियों को अपने वश में करके वह जो प्रकृति का स्वामी बन बैठा है उसका मूल सहयोग की प्रवृत्ति में ही है । इसके फल से उसमें एकता शक्ति, मिलन शक्ति, सामाजिकता, मैत्री की भावना आदि का आविर्भाव हुआ और उसकी शक्ति बढ़ती गई।  मनुष्यों ने आपस में एक - दूसरे को सहयोग दिया, अपनी स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों को आपस में मिलाया, इस मिलन से ऐसी-ऐसी चेतनाएँ, सुविधाएँ उत्पन्न हुई जिनके कारण उसके उत्कर्ष का मार्ग दिन-दिन बढ़ता गया । दूसरे प्राणी जो साधारणतः शारीरिक दृष्टि से मनुष्य की अपेक्षा कहीं सक्षम थे, इस मैत्री भावना, सम्मिलन योग्यता के अभाव में जहाँ के तहाँ पड़े रहे, वे अति प्राचीनकाल में जैसे थे वैसे ही अब भी बने हुए हैं।  मनुष्य की तरह उन्नति का सुविस्तृत क्षेत्र वे प्राप्त न कर सके । संघ शक्ति भी एक महान शक्ति है । उसे भले या बुरे जिस भी मार्ग में, जिस भी कार्य में लगाया जायगा उधर ही आश्चर्यजनक सफलता के दर्शन होंगे। मनुष्यों में भी अनेक देश, जा