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Showing posts from January, 2021

व्यावहारिक अध्यात्म का महत्व

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                                                     www.frontknowledge.blogspot.com महाराजा रविशंकर के पास कहीं से सवा सौ मन अनाज आया था। उनके पास संपन्न व्यक्ति प्रायः इस उद्देश्य से कुछ न कुछ भिजवाते थे कि उसे निर्धनों में बँटवा दिया जाए और जिनके पास खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने के पर्याप्त साधन नहीं हैं, उनकी कुछ सेवा-सहायता हो सके। महाराज रविशंकर ने हमेशा की भाँति वह अनाज बाँटने का प्रबंध किया और गरीबों की बस्ती में गये।  उस बस्ती में खेल रही थी एक बालिका। महाराज  ने उसे देखकर कहा- जा बिटिया तू भी कोई बर्तन ले आ और अपने हिस्से का अनाज ले ले। लड़की ने कहा-  मेरी माँ मजदूरी से आती होगी। पैसे उसी के पास है, जब वह आएगी तब हम अनाज ले लेंगे। लड़की समझती  थी कि महाराज अनाज खरीदने के लिए कह रहे हैं, परंतु जब उसे बताया गया कि यह अनाज बेचा नहीं जा रहा, बल्कि मुफ्त में बाँटा जा रहा है तो उसने लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसका कारण पूछा तो वह बोली- " स्वामी जी! मेरी माँ ने मुझे सिखाया है कि मुफ्त में किसी से कुछ न लेना चाहिए, देने वाला भले ही भगवान क्यों न हो!"  "अच्छा।"  छोटी स

पृथ्वी और सौरमंडल

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                            www.frontknowledge.blogspot.com  पृथ्वी के चतुर्दिक अनंत अंतरिक्ष को हम 'विश्व' कहते हैं। पृथ्वी पर जीवन को बनाये रखने वाला सूर्य उन असंख्य तारों में से एक है, जो रात्रि में आकाश में जगमगाते रहते हैं। अंतरिक्ष में पृथ्वी का स्थान वैसा ही है, जैसा कि पृथ्वी पर किसी रेत-कण के एक हजारवें भाग का। अंतरिक्ष में तारे एक-दूसरे से बहुत दूरी पर स्थित हैं। ब्रह्मांड में पृथ्वी उन नौ ग्रहों में से एक है, जो एक ही केंद्रीय तारे के चारों ओर परिक्रमा करते रहते हैं। इस तारे को हम 'सूर्य' कहते हैं।  सूर्य उन खरबों तारों में से एक है, जो ब्रह्मांड में विद्यमान हैं। अंतरिक्ष में ये तारे बड़े-बड़े गुच्छे अथवा समूहों में पाए जाते हैं। तारों के ये समूह आकाशगंगा कहलाते हैं। खगोलशास्त्रियों  के अनुसार, विश्व में सहर्सों अरब आकाशगंगाऐं हैं। प्रत्येक अकाशगंगा में औसतन एक सौ अरब तारे होते हैं। हमारा सौरमंडल अपनी आकाशगंगा के बाहरी छोर के निकट स्थित है। अंतरिक्ष पृथ्वी के वातावरण के बाहर के स्थान को कहा जाता है। यह अनंत है। इसके आयामों को प्रकाश वर्ष नामक खगोलीय इकाई द्वार

साधना की सफलता का रहस्य

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                           www.frontknowledge.blogspot.com महाराजा प्रियव्रत राजकाज से सन्यास लेने तथा शेष जीवन को ईश्वर प्राप्ति के निमित्त कठोर साधनाओं में नियोजित करने का निश्चय कर चुके   थे। वह घड़ी आई, संन्यास दीक्षा सम्पन्न हुई। राज पुरोहित ने संन्यास धर्म की गरिमा बताई। राजकुमार आग्नीघ्र भी दीक्षा स्थली पर उपस्थित थे। जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है:- ईश्वरप्राप्ति। इस उदबोधन से राजकुमार के मन में हलचल मच गई। भोग-विलास से युक्त राजपाट छोड़कर पिताश्री आत्मोत्थान का श्रेय मार्ग अपना रहे हैं, मुझे भी उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। आग्नीघ्र के मन में यह विचार घूमने लगा। विनीत स्वर में उन्होंने महाराज से निवेदन किया- " तात! सुख संपन्नता, राज्य वैभव का परित्याग करके आप जीवन मुक्ति के लिए तप करने जा रहे हैं। फिर मेरे ही पैरों में राज्य वैभव का बंधन क्यों डाल रहे हैं? मुझे भी     अपना अनुगमन करने की आज्ञा दीजिये।" महाराज प्रियव्रत एक कुशल शासक तो थे ही, पर सूक्ष्मदर्शी भी थे। उन्हें मालूम था, कि वैराग्य के बीज राजकुमार में विद्यमान हैं। पर वर्तमान दायित्वों की उपेक्षा करके एकांकी स

सूर्योपासना और परमात्मा का स्मरण

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                          www.frontknowledge.blogspot.com सूर्य को प्रकाश और तेज का प्रतीक माना गया है। लेटेंट लाइट, डिवाइन लाइट, ब्रह्मज्योति आदि शब्दों में मानवी सत्ता में दैवी अवतरण के प्रकाश के उदय की संज्ञा दी गई है। प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य को सविता कहा गया है और उसे ज्ञा‌नस्वरूप परमात्मा का प्रतीक मानकर उपासना-आराधना करने का निर्देश आर्षग्रंथों में दिया गया है।  महाभारत में कहा गया है-"सूर्योदय के समय जो सविता देवता की भली प्रकार उपासना करता है, वह धृति, मेधा और प्रज्ञा को प्रचुर परिमाण में प्राप्त करता है।" इसी तरह सूर्य पुराण, तैत्तरीय आरण्यक एवं श्रीमदभागवत में भी उदय होते हुए, अस्त होते हुए सूर्य का ध्यान करने और सब प्रकार से कल्याण का भागी बनने, पवित्र बनने की बात कही गई है।  शास्त्रकारों  का कथन है कि संध्या-वंदन के अनेक विधि-विधान हैं। वे कितने ही क्रियाकृत्यों के साथ जुडे हुए हैं, पर उन सबमें संक्षिप्त और सरल यह है कि प्रातः-सायं सूर्योपासना की जाए, क्योंकि सूर्य ही प्रत्यक्ष एवं परम् ज्योतिर्मय सर्व प्रकाशक सबके उत्पादक देवता हैं। प्रजा के लिए प्राण बनकर वही

सादगी की सामाजिक उपयोगिता

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                           www.frontknowledge.blogspot.com सादगी को सभ्यता का, महानता का चिन्ह माना गया है। संसार के सभी महापुरुषों ने "सादा जीवन उच्च विचार" के आदर्श को अपनाया और उत्कर्ष पथ पर आगे बढे हैं। व्यक्तिगत जीवन में अभाव, निर्धनता और गरीबी नैसर्गिक सुख-शांति को नष्ट न कर सके, इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी आवश्यकताएँ उतनी ही रखें, जिन्हें सीमित आय में पूरा किया जा सके।  सादगी का सिद्धांत न केवल व्यक्तिगत जीवन में उपयोगी है, वरन सामाजिक सुव्यवस्था के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण है। आवश्यकताएँ बढती हैं तो उनकी पूर्ति के लिए अतिरिक्त साधन जुटाना भी जरूरी हो जाता है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि व्यक्ति को अपनी बढी हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अतिरिक्त श्रम करना पड़े या अपनी क्षमता से भी अधिक प्रयास करना आवश्यक हो जाए।  आवश्कताएँ जब बढनी शुरू हो जाती हैं तो वे किसी भी सीमा पर रुक नहीं सकतीं। यह भी जरुरी और वह भी जरूरी वाली स्थिति धीरे-धीरे बनने लगती है और वास्तविकता का तत्क्षण ज्ञान न होने से उन पर अंकुश भी नहीं लग पाता। मनोरथों का कोई पारावार जो नहीं  है।  वस्तुतः

भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है।

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www.frontknowledge.blogspot.com रोटी का स्वाद वह जानता है, जिसने परिश्रम करने के पश्चात् क्षुधार्त होकर ग्रास तोडा हो। धन का उपयोग वह जानता है, जिसने पसीना बहाकर कमाया हो। सफलता का मूल्यांकन वही कर सकता है, जिसने  अनेक कठिनाइयों, बाधाओं और असफलताओं से संघर्ष किया हो। जो विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं के बीच मुस्कराते रहना और हर असफलता के बाद बडे उत्साह से आगे बढना जानता है,  वस्तुतः वही विजय -लक्ष्मी का अधिकारी होता है।  जो लोग सफलता के मार्ग में होने वाले विलंब की धैर्यपूर्वक प्रतिक्षा नहीं कर सकते,जो लोग अभीष्ट प्राप्ति के पथ में आने वाली बाधाओं से लडना नहीं जानते, वे अपनी अयोग्यता और ओछेपन को बेचारे भाग्य के ऊपर थोपकर स्वयं निर्दोष बनने का उपहासास्पद प्रयत्न करते हैं।  ऐसी आत्मप्रवंचना से लाभ कुछ नहीं, हानि अपार है। सबसे बडी हानि यह है कि अपने को अभागा मानने वाला मनुष्य आशा के प्रकाश से हाथ धो बैठता है,और निराशा के अंधकार में भटकते रहने के कारण इष्ट प्राप्ति से कोसों पीछे रह जाता है। बाधाएँ, कठिनाइयाँ, आपत्तियाँ और असफलताएँ एक प्रकार की कसौटी हैं, जिन पर पात्र-कुपात्र की, खरे-खोटे की