भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है।

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रोटी का स्वाद वह जानता है, जिसने परिश्रम करने के पश्चात् क्षुधार्त होकर ग्रास तोडा हो। धन का उपयोग वह जानता है, जिसने पसीना बहाकर कमाया हो। सफलता का मूल्यांकन वही कर सकता है, जिसने  अनेक कठिनाइयों, बाधाओं और असफलताओं से संघर्ष किया हो।


जो विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं के बीच मुस्कराते रहना और हर असफलता के बाद बडे उत्साह से आगे बढना जानता है,  वस्तुतः वही विजय -लक्ष्मी का अधिकारी होता है। 
जो लोग सफलता के मार्ग में होने वाले विलंब की धैर्यपूर्वक प्रतिक्षा नहीं कर सकते,जो लोग अभीष्ट प्राप्ति के पथ में आने वाली बाधाओं से लडना नहीं जानते, वे अपनी अयोग्यता और ओछेपन को बेचारे भाग्य के ऊपर थोपकर स्वयं निर्दोष बनने का उपहासास्पद प्रयत्न करते हैं।


 ऐसी आत्मप्रवंचना से लाभ कुछ नहीं, हानि अपार है। सबसे बडी हानि यह है कि अपने को अभागा मानने वाला मनुष्य आशा के प्रकाश से हाथ धो बैठता है,और निराशा के अंधकार में भटकते रहने के कारण इष्ट प्राप्ति से कोसों पीछे रह जाता है।



बाधाएँ, कठिनाइयाँ, आपत्तियाँ और असफलताएँ एक प्रकार की कसौटी हैं, जिन पर पात्र-कुपात्र की, खरे-खोटे की परख होती है। जो इस कसौटी पर उतरते हैं, सफलता के अधिकारी सिद्ध होते हैं, उन्हें ही इष्ट की प्राप्ति होती है।

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