सादगी की सामाजिक उपयोगिता



Sadgi ki samajik upyogita
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सादगी को सभ्यता का, महानता का चिन्ह माना गया है। संसार के सभी महापुरुषों ने "सादा जीवन उच्च विचार" के आदर्श को अपनाया और उत्कर्ष पथ पर आगे बढे हैं। व्यक्तिगत जीवन में अभाव, निर्धनता और गरीबी नैसर्गिक सुख-शांति को नष्ट न कर सके, इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी आवश्यकताएँ उतनी ही रखें, जिन्हें सीमित आय में पूरा किया जा सके।


 सादगी का सिद्धांत न केवल व्यक्तिगत जीवन में उपयोगी है, वरन सामाजिक सुव्यवस्था के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण है।आवश्यकताएँ बढती हैं तो उनकी पूर्ति के लिए अतिरिक्त साधन जुटाना भी जरूरी हो जाता है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि व्यक्ति को अपनी बढी हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अतिरिक्त श्रम करना पड़े या अपनी क्षमता से भी अधिक प्रयास करना आवश्यक हो जाए।


 आवश्कताएँ जब बढनी शुरू हो जाती हैं तो वे किसी भी सीमा पर रुक नहीं सकतीं। यह भी जरुरी और वह भी जरूरी वाली स्थिति धीरे-धीरे बनने लगती है और वास्तविकता का तत्क्षण ज्ञान न होने से उन पर अंकुश भी नहीं लग पाता। मनोरथों का कोई पारावार जो नहीं  है। वस्तुतः आवश्यकताएँ उत्पन्न होती ही मनोरथों से हैं। 


मन कभी इस चीज को जरूरी बताता है तो कभी उस चीज को। एक के पूरी होते ही और नई जरूरतें उत्पन्न हो जाती हैं। इसीलिए मनीषियों ने कहा है कि मनोरथों की कोई अंतिम सीमा नहीं है और इसी प्रकार उससे जनित आवश्यकताओं की भी नहीं। यह निश्चित रूप से कभी नहीं कहा जा सकता कि अमुक वस्तु मिल जाने पर हम संतुष्ट हो जाएँगे और फिर कोई नई माँग नहीं रखेंगे।


 इस संदर्भ में विचारकों का कहना है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव कर ले कि आवश्यकताओं को बढाते रहना व्यक्तिगत रुप से शांति में आग लगाता है तथा सामाजिक जीवन को भी नष्ट करता है, तो लोगों को सादगी अपनाने के लिए तैयार करने हेतु अन्य अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पडेंगे।


 वस्तुतः सादगी से रहने वाले व्यक्ति ही समाज के विकास में योगदान दे सकते हैं। महामना मालवीय, गांधी, बिनोवा,जमनालाल बजाज, सरदार पटेल, राम मनोहर लोहिया, राम प्रकाश नारायन जैसे कितने ही भारतीय महापुरुषों ने अपने जीवन में सादगी का समावेश करके बचे हुए श्रम, समय और मनोयोग से राष्ट्र की महती एवं अविस्मरणीय सेवा की। 


समूची यूनानी सभ्यता को लोग आज सुकरात और अरस्तू के कारण जानते हैं। इन महामानवों के संबंध में विख्यात है कि ये रोजमर्रा के जीवन में कितने मितव्ययी तथा अल्प-संतोषी रहे थे। अरस्तू के संबंध में तो कहा जाता है कि एक बार उनसे किसी ने पूछा- "आज थोडे से साधनों और नहीं के बराबर संपत्ति में ही आप कैसे सुखपूर्वक रह लेते हैं?


 लोगों को अपनी आवश्यकताओं के साधन जुटाने से ही अवकाश नहीं मिलता और आप हैं कि कोई साधन न रहते हुए भी साधन संपन्न लोगों से अधिक सुखी हैं तथा दार्शनिक चिंतन भी कर लेते हैं। " अरस्तु का एक ही उत्तर था-" जहाँ तक आवश्यकताओं का संबंध है, मैं उन्हें कम से कम  रखता हूँ तथा उन्हें बढाता भी नहीं। 


उनके औचित्य की मेरे पास एक ही कसौटी है और उस कसौटी पर जो खरी उतर जाती हैं, उन्हें ही पूरा करना उचित समझता हूँ,  अन्यथा उन्हें अपनी सूची से अलग हटा देता हूँ। "पूछा गया-"  यह कसौटी क्या है?" तो अरस्तू का कहना था-" यह कि बाजार से कोई भी वस्तु खरीदने से पहले मैं सोचता हूँ कि इस वस्तु के बिना भी काम चल सकता है तो उसे खरीदकर अपने समय और श्रम का अपव्यय क्यों किया जाए? 


और यदि काम नहीं चल सकता है तो खरीदना ही चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार चलने के कारण में चिंतन एवं साहित्य साधना में अधिक-से-अधिक समय लगा पाता हूँ तथा मानवता की सेवा कर सकता हूँ। यदि आवश्यक सी लगने वाली अनावश्यक वस्तुएँ ही जुटाने में लगा रहूँ तो मुझे मनुष्यता की सेवा करने का अवसर ही न मिले। 


सादगी अपनाने का वस्तुतः मूल उद्देश्य ही यह है कि हम अपनी कार्यक्षमता बढा लें तथा अधिक से अधिक कार्य करें। यह तभी संभव है, जब श्रम, समय, मनोयोग जैसी अमूल्य संपदा की बचत की जा सके। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह की सादगी अपनाने से मनुष्य पुनः शताब्दियों पीछे का जीवन जीने लगेगा, तब विज्ञान ने जो साधन उपलब्ध कराए हैं, वे भी निरुपयोगी हो जाएँगे। 


सादगी वस्तुओं या साधनों के उपयोग से नहीं रोकती, वह तो केवल दृष्टिकोण भर बदलती है तथा साधनों को और अधिक उपयोगी बनाती है। इस प्रकार विवेकपूर्वक अपनाई गई सादगी मानवी सभ्यता को और आगे बढाने में समर्थ होती है।


पिछले दिनों जब कि साधनों का अभाव रहा, तब भी महापुरुषों ने बिना साधनों के सादगी अपनाकर मानवी सभ्यता को यहाँ तक पहुँचा दिया। अब जब कि साधन-सुविधा काफी बढ चुके हैं, तब तो विकास और द्रुतगति से होना चाहिए।





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