पृथ्वी और सौरमंडल


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 पृथ्वी के चतुर्दिक अनंत अंतरिक्ष को हम 'विश्व' कहते हैं। पृथ्वी पर जीवन को बनाये रखने वाला सूर्य उन असंख्य तारों में से एक है, जो रात्रि में आकाश में जगमगाते रहते हैं। अंतरिक्ष में पृथ्वी का स्थान वैसा ही है, जैसा कि पृथ्वी पर किसी रेत-कण के एक हजारवें भाग का। अंतरिक्ष में तारे एक-दूसरे से बहुत दूरी पर स्थित हैं। ब्रह्मांड में पृथ्वी उन नौ ग्रहों में से एक है, जो एक ही केंद्रीय तारे के चारों ओर परिक्रमा करते रहते हैं। इस तारे को हम 'सूर्य' कहते हैं। 


सूर्य उन खरबों तारों में से एक है, जो ब्रह्मांड में विद्यमान हैं। अंतरिक्ष में ये तारे बड़े-बड़े गुच्छे अथवा समूहों में पाए जाते हैं। तारों के ये समूह आकाशगंगा कहलाते हैं। खगोलशास्त्रियों  के अनुसार, विश्व में सहर्सों अरब आकाशगंगाऐं हैं। प्रत्येक अकाशगंगा में औसतन एक सौ अरब तारे होते हैं। हमारा सौरमंडल अपनी आकाशगंगा के बाहरी छोर के निकट स्थित है। अंतरिक्ष पृथ्वी के वातावरण के बाहर के स्थान को कहा जाता है। यह अनंत है। इसके आयामों को प्रकाश वर्ष नामक खगोलीय इकाई द्वारा मापना कुछ हद तक संभव हो पाया है।



बाह्य संसार के प्रभाव को हम प्रकाश अथवा ध्वनि के माध्यम से ग्रहण करते हैं। परंतु कुछ ऐसे भी प्रकाश हैं, जिन्हें देखा नहीं जा सकता तथा कुछ ऐसी भी ध्वनियाँ हैं, जिन्हें सुना नहीं जा सकता। इसकी जानकारी 1800 ई. में हुई, जब ब्रिटिश खगोलज्ञ 'विलियम हर्शेल' ने इंफ्रारेड विकिरण का पता लगाया। जब सूर्य का प्रकाश (त्रिपाश्र्व) में प्रवेश करता है तो वह सात रंगों में विभक्त हो जाता है। ये सात रंग विबग्योर (VIBGYOR)  शब्द द्वारा व्याख्यायित किये जाते हैं। इस शब्द में अक्षर वी-वायलेट (बैंगनी), आई- इंडिगो  (जामुनी),  बी-ब्लू  (नीला),  जी-ग्रीन (हरा),  वाई- येलो  (पिला),  ओ-ऑरेंज  (नारंगी)  और आर-रेड  (लाल)  रंग के लिए प्रयुक्त किये गए हैं। सौर  वर्ण पर ताप के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए 'हर्शेल' ने स्पेक्ट्रम के हर रंग में एक-एक थर्मामीटर लगाया। 



स्पेक्ट्रम के बाहर रखे थर्मामीटर में गर्मी की मात्रा ज्यादा दिखाई पड़ी।

इन किरणों को अवरक्त किरण (लाल के नीचे, इंफ्रारेड) कहा गया। 

सन्  1801 ई. में जॉन रिटर ने पता लगाया कि बैंगनी छोर पर स्पेक्ट्रम के बाहर की किरणें, सिल्वर क्लोराइड के स्पेक्ट्रम के अंदर दृश्यमान क्षेत्र की किरणों की अपेक्षा जल्दी खंडित कर देती हैं। इनको Altraviolet    (पराबैंगनी)  किरणों का नाम दिया गया। इन सभी तरंगों, विकिरणों, इनके तरंगदैर्घ्य, आवृति आदि की सहायता से अंतरिक्ष का अध्ययन कुछ हद तक सरल हो पाया है। लगभग  500 करोड़ वर्ष पूर्व निर्मित सूर्य के चारों ओर गैसों का बादल था, जिनका  स्वरूप  डिस्क  की तरह  था। 

इन गैसों के संघनित होने  पर उनके छोटे-छोटे पिंडों का विकास हुआ , जिन्हें  ग्रहाणु  (प्लांटेसिमल्स) कहते हैं। ये ग्रहाणु लगातार टूटने- जुड़ने की प्रकिया में लगे रहते हैं। कालांतर में इनसे ग्रहों के आकार के पिंड बनने प्रारम्भ  हो गए और इस प्रकार ग्रहों की उत्पत्ति हुई।




 

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