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Showing posts from February, 2021

5 आदतें जो आपके स्वास्थ्य को बेहतर बना देंगे || Health tips in hindi

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                              www.frontknowledge.blogspot.com       स्वस्थ जीवन का मतलब होता है, अच्छा स्वास्थ्य और समझदार दिमाग।  यदि आप शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से फिट रहना चाहते हैं, तो आपको हर दिन अच्छी आदतों का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। आपको वही करना चाहिए जो आपके दिमाग और आपके शरीर के लिए सही हो।   अपनी जीवनशैली और आदतों का ध्यान रखना आपको अपने बारे में अच्छा महसूस कराता है।  यह आपके आत्म-सम्मान और आत्म-छवि को बढ़ाता है।  हर किसी के लिए स्वस्थ जीवन जीना महत्वपूर्ण है।  धूम्रपान, मादक द्रव्यों के सेवन और शराब के सेवन जैसी बुरी आदतों का शिकार नहीं होना चाहिए।  ये आदतें आपके स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं, और यदि एक बार जब आप आदी हो जाते हैं, तो इससे कोई वापसी नहीं होती है।  स्वस्थ रहने के बहुत सारे तरीके हैं।  एक स्वस्थ जीवन शैली बीमारियों को रोकती है और आपको पुरानी बीमारियों से दूर रखती है।  अच्छी आदतें आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाती हैं और आपको फिट रहने में मदद करती हैं।  एक व्यक्ति का संपूर्ण स्वास्थ्य और कल्याण इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपना जीवन कैसे ज

शहद एक संजीवनी

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                           www.frontknowledge.blogspot.com                  शहद प्रकृतिप्रदत्त एक चमत्कारी उपहार है, जिसकी उत्पत्ति सूर्य की रोशनी, फूल के पराग एवं सुगंध की रासायनिक क्रियाओं से होती है। इसका निर्माण करने वाली मधुमक्खियाँ परमार्थभाव एवं आपसी सहकार से इसे बनाती, पकाती एवं मनुष्य को प्रदान करती हैं।  यह समस्त विटामिनों के साथ सत्तर तत्त्वों के संगठन से उत्पादित मिश्रण है, जिसमें पोषक क्षमता तो अद्भुत है ही, साथ ही औषधियुक्त गुण भी हैं। ये किसी भी परिस्थिति में नष्ट नहीं होते। शहद में फुरती बढ़ाने, पेट को संतुलित रखने, पाचनतंत्र को सुव्यवस्थित बनाने, स्मरण शक्ति को विकसित करने एवं बुद्धि विकास के साथ प्रत्युत्पन्नमति मेधा विकसित करने की अद्भुत क्षमता है।  एक शब्द में इसे संजीवनी बूटी एवं अमृत कहा जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। सरदी के दिनों में शरीर को गरम बनाए रखने एवं सरदी जुकाम से बचाए रखने में लोग बादाम को शहद में मिलाकर लिया करते थे एवं शक्तिवर्द्धक टॉनिक के रूप में इसका उपयोग करते थे। प्राचीनकाल के अधिकांश लोग शारीरिक गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए शहद का ही प्

माता के आभूषण

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                                   www.frontknowledge.blogspot.com उन्नीसवीं शताब्दी अपनी अंतिम साँसें गिन रही थी और गिन रहा था अपने जीवन के आखिरी साल एक वयोवृद्ध बंगाली । नाम था उसका ठाकुरदास और परिवार में केवल एक बच्चा तथा पत्नी थे। इस सीमित परिवार का भरण-पोषण भी ठीक प्रकार से न हो पाता था। ठाकुरदास दो रुपये माहवार की नौकरी करते थे और उसी से अपने परिवार का गुजारा तथा लड़के का खरच चलाते थे।  पहले तो ठाकुरदास को कलकत्ता की गलियों और सड़कों पर भटकना पड़ा। कभी भोजन का प्रबंध हो जाता था, कभी दोनों वक्त का और कभी-कभी एक ही वक्त का ऐसे भी कई अवसर आए थे जबकि घर में किसी के मुँह में एक रोटी तो दूर एक दाना भी नहीं पहुँच पाया। माँ व्यथित, पिता परेशान और पुत्र का भविष्य अनिश्चित।  आशा की एक ही किरण थी, कभी तो भगवान सुनेगा और अभी वह किरण उदित होने का समय नहीं आया था शायद। लेकिन फिर भी बड़े धैर्य के साथ दोनों पति-पत्नी प्रतीक्षा कर रहे थे। पुत्र तो अभी समझने लायक भी नहीं था। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई तो नियति ने उन्हें मेदिनीपुर जिले के एक गाँव में ला पटका।  वहाँ ठाकुरदास को दो रुपये माहवार

संघर्ष से घबराएँ नहीं - सफलता चरण चूमेगी

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                        www.frontknowledge.blogspot.com                अमेरिका का प्रसिद्ध नगर शिकागो, सरदी के दिन, व्यस्त राजमार्ग पर भी बहुत कम चहल-पहल नजर आ रही थी। जितने अमेरिकी सड़क पर गुजरते हुए दिखाई भी देते, वे लंबा ऊनी कोट पहने और कैप लगाए थे। होटल और रेस्ट्रा खचाखच भरे थे। लोग गरम चीजें खा-पीकर अपनी ठंढ को भुलाने का प्रयास कर रहे थे।  ऐसी ठंड में एक भारतीय संन्यासी बोस्टन से आने वाली रेलगाड़ी से शिकागो स्टेशन पर उतरा । कपड़े गेरुए रंग के थे। सिर पर पगड़ी बँधी थी, जिसका रंग भी गेरुआ ही था विचित्र वेशभूषा को देखकर अनेक यात्रियों की दृष्टि उस पर जम गई। वह फाटक पर पहुँचा। लंबे चोंगे की जेब से टिकिट निकाला और टिकिट कलेक्टर को देकर वह प्लेटफार्म से बाहर आ गया।  उसे देखने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। भीड़ में से ही किसी ने पूछ लिया- 'आप कहाँ से आए हैं?' बोस्टन से, पर निवासी भारत का हूँ। यहाँ किससे मिलना है। डॉक्टर बैरोज से। 'कौन डॉक्टर बैरोज। 'संन्यासी ने अपने चोंगे की जेब में हाथ डाला पर हाथ खाली ही निकला। 'क्यों? क्या हुआ ?' 'मैं डॉक्टर बैरोज के नाम ब

महाद्वीपों एवं महासागरों की उत्पत्ति का रहस्य

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                     www.frontknowledge.blogspot.com                  महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों-भूगर्भशास्त्रियों में मतान्तर रहा है। इस सम्बन्ध में सामने आये प्रमुख सिद्धांतों का विवरण निम्नवत है:---  (संकुचन पर आधारित सिद्धान्त):--.  कई वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की उत्पत्ति ऊष्ण-तरल पदार्थों के रूप में हुई, जो धीरे-धीरे ठोस में परिवर्तित हो चुकी है या हो रही है।  इस प्रक्रिया द्वारा पृथ्वी का बाह्यतम भाग सबसे पहले ठण्डा हुआ, उसके बाद आन्तरिक भाग धीरे-धीरे ठण्डा हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप बाह्य भाग का आंतरिक भाग पर दबाव पड़ा, जिससे पृथ्वी के विभिन्न भागों में कहीं उभार तथा कहीं धंसाव की प्रक्रिया होती रही, जिसके फलस्वरूप महासागरों तथा महाद्वीपों का निर्माण हुआ।  ऊँचा भाग महाद्वीप तथा धंसा भाग महासागर (जलाच्छादित) कहलाया। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन लॉर्ड केलविन, सोलास, लेपवर्थ जैसे भू-वैज्ञानिकों ने किया। परन्तु इस परिकल्पना को मान्यता नहीं दी गयी। इसके बाद ग्रीन की चतुष्फलक परिकल्पना प्रकाश में आयी, जिसको इन्होंने 1875 में प्रस्तुत किया।  इसके

देवभाषा संस्कृत का महत्व

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                            www.frontknowledge.blogspot.com देवभाषा का दर्जा प्राप्त संस्कृत का पूरे भारतीय समाज के साथ सांस्कृतिक संबंध है। विद्वानों का मानना है कि इसका आरंभ 1500 से 1200 ई. पृ. खोजा जा सकता है। यह काल पू. ऋग्वैदिक काव्यों का काल है। दरअसल हमारे यहाँ श्रुति और स्मृति की लंबी परंपरा रही है। ऐसे में इस भाषा का उद्भव व विकास खोजना इतना आसान नहीं रहा।  वैसे वैदिक काल में वेदों के पवित्र श्लोक, मंत्र तथा ऋचाएं मिलती हैं। फिर इसी दौर में धार्मिक अनुष्ठानों, मंत्रों आदि की भी भरपूर रचना हुई। पुराण, आरण्यक, उपनिषद् आदि इसी काल की रचनाएं हैं। वैसे संस्कृत का वास्तविक इतिहास पाणिनी (5वीं सदी) के काल से माना जाता है। इसी दौरान वेदान्त की रचना हुई। पाणिनी ने तो खैर 'अष्टाध्यायी' लिखा ही।  पिंगल छंद भी इसी दौर में रचे गये। इसके बाद लौकिक संस्कृत का अभ्युदय हुआ। आख्यायिकाएं, प्रशस्तिकाव्य, वाल्मीकि का रामायण, व्यास का महाभारत इसी काल की रचनाएं मानी जाती हैं। महाभारत का काल ईसा पूर्व 1000 वर्ष माना जाता है। इसी दौरान देश के करोड़ों लोगों की प्रेरणास्त्रोत रही 'गीता'

सांसारिक उन्नति का रहस्य

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                           www.frontknowledge.blogspot.com                                   संसार में मनुष्य ने आज तक जो आश्चर्यजनक उन्नति की है और समस्त प्राणियों को अपने वश में करके वह जो प्रकृति का स्वामी बन बैठा है उसका मूल सहयोग की प्रवृत्ति में ही है । इसके फल से उसमें एकता शक्ति, मिलन शक्ति, सामाजिकता, मैत्री की भावना आदि का आविर्भाव हुआ और उसकी शक्ति बढ़ती गई।  मनुष्यों ने आपस में एक - दूसरे को सहयोग दिया, अपनी स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों को आपस में मिलाया, इस मिलन से ऐसी-ऐसी चेतनाएँ, सुविधाएँ उत्पन्न हुई जिनके कारण उसके उत्कर्ष का मार्ग दिन-दिन बढ़ता गया । दूसरे प्राणी जो साधारणतः शारीरिक दृष्टि से मनुष्य की अपेक्षा कहीं सक्षम थे, इस मैत्री भावना, सम्मिलन योग्यता के अभाव में जहाँ के तहाँ पड़े रहे, वे अति प्राचीनकाल में जैसे थे वैसे ही अब भी बने हुए हैं।  मनुष्य की तरह उन्नति का सुविस्तृत क्षेत्र वे प्राप्त न कर सके । संघ शक्ति भी एक महान शक्ति है । उसे भले या बुरे जिस भी मार्ग में, जिस भी कार्य में लगाया जायगा उधर ही आश्चर्यजनक सफलता के दर्शन होंगे। मनुष्यों में भी अनेक देश, जा

सामाजिक सहयोग की आवश्यकता

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                              www.frontknowledge.blogspot.com     शिष्टाचार और सद्व्यवहार के तत्व को समझने के लिए आवश्यक है कि पहले हम मानव जीवन में सहयोग की भावना की उपादेयता को समझें । मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के कारण अपने आप पूर्ण नहीं है । मेंढक का बच्चा जन्म लेने के बाद अपने आप, अपने बाहुबल से अपना जीवन यापन कर लेता है, परन्तु मनुष्य का बच्चा बिना दूसरे की सहायता के एक दिन भी जीवित नहीं रह सकता। उसे माता-पिता की, वस्त्रों की, मकान की, चिकित्सा की आवश्यकता होती है । यह चीजें दूसरों की सहायता पर निर्भर हैं । बड़े होने पर भी उसे भोजन, वस्त्र, व्यापार, शिक्षा, मनोरंजन आदि की जिन वस्तुओं की जरूरत पड़ती है वे उसे दूसरों की सहायता से ही प्राप्त होती हैं। यही कारण है कि मनुष्य सदा ही दूसरों के सहयोग का भिखारी रहता है । यह सहयोग उसे प्राप्त न हो तो उसका जीवन निर्वाह होना कठिन है ।  अपना अस्तित्व स्थिर रखने के लिए मानव प्राणी (जो कि अन्य प्राणियों की अपेक्षा बहुत कमजोर है) दूसरों का सहयोग लेता है और उन्हें अपना सहयोग देता है । रुपये को माध्यम बनाकर इस सहयोग को आदान-प्रदान समाज में प्रचलित

वीर बालक अभिमन्यु

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            www.frontknowledge.blogspot.com          कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का युद्ध चल रहा था संपूर्ण भारत के राजे-महाराजे इस युद्ध में सम्मिलित थे। धनुर्धारी अर्जुन ने अपने बाणों से भीष्म पितामह को शर-शय्या पर गिरा दिया था। उनके बाद दुर्योधन ने द्रोणाचार्य को कौरव सेना का सेनापति बनाया था। दुर्योधन आचार्य से बार-बार यही कहता रहता था-" आप पांडवों का पक्ष कर रहे हैं।  वरना आपके लिए पांडवों को हराना कोई कठिन कार्य नहीं है। (द्रोणाचार्य का कहना था कि अर्जुन के रहते हुए पांडव सेना को देवता भी नहीं हरा सकते। यदि तुम किसी प्रकार अर्जुन को युद्ध से हटा दो तो मैं शेष सबको हरा दूँगा) दुर्योधन ने इसी उद्देश्य से संशप्तक नामक वीरों को उकसाया। अर्जुन किसी की चुनौती को सुनकर चुप बैठने वाले नहीं थे।  वे संशप्तक से युद्ध करने के लिए संग्राम की मुख्य भूमि से बहुत दूर निकल गए। द्रोणाचार्य को इसी अवसर की प्रतीक्षा थी। उन्होंने अपनी सेना के द्वारा चक्रव्यूह नामक व्यूह बनवाया। धर्मराज युधिष्ठिर को जब इसका पता लगा तो वे अत्यधिक चिंतित हुए। पांडव पक्ष में केवल अर्जुन ही चक्रव्यूह को तोड़ना ज

आदर्श बालक श्रवण कुमार

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                              www.frontknowledge.blogspot.com मातृ देवो भव, पित देवी भव आचार्य देवो भव, यही भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है। आइए हम एक ऐसे बालक के बारे में जानें जिसने इस मंत्र के आधार पर अपना सारा जीवन माता-पिता की सेवा में अर्पित कर दिया । उस बालक का नाम था-श्रवण कुमार श्रवण कुमार राजा दशरथ के अयोध्या राज्य का रहने वाला था उसके पिता का नाम शांतनु तथा माता का नाम भाग्यवती उसके माता-पिता वृद्ध और अंधे थे।  श्रवण कुमार उनका इकलौता पुत्र या। वह अपने माता-पिता की बड़ी सेवा करता था। वह उन्हें नहलाता, कपड़े बदलता और रोटो बनाकर खिलाता था। वह हर घड़ी उनकी सेवा में हो लुगा रहता था। समय बोलता चला गया (किसी संत ने उसे बताया कि यदि वह अपने माता-पिता को सारे तीर्थ कराकर उनका जल उनकी आँखों से लगाए तो उनकी आँखों की ज्योति वापस आ सकती है) रावण के सामने समस्या यह थी कि वह अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा कैसे कराए? उस समय आजकल को तरह आवागमन की सुविधा नहीं थी।  उसने एक वहंगी (कांवर) बनाई और एक-एक पलड़े में माता-पिता को बैठाकर तीर्थयात्रा को निकल पड़ा। अनेक देशों का भ्रमण कर वह अपने अ

परिश्रम की कमाई में आस्थावान रैदास

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                  www.frontknowledge.blogspot.com               भक्त रैदास के बारे में एक किंवदंती इस प्रकार है:-  रैदास फटे जूते की सिलाई में ऐसे तल्लीन थे कि सामने कौन खड़ा है, इसका उन्हें पता न चला। आगंतुक भी कब तक प्रतीक्षा करता, उसने खाँसकर रैदास का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। रैदास ने दृष्टि ऊपर उठाई।  सामने एक भद्र पुरुष को प्रतीक्षारत देख वह हड़बड़ा कर खड़े हो गए और विनय शब्दों में बोले-'क्षमा कीजिए मेरा ध्यान काम में था। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? क्षमा की बात सुनते ही आगंतुक को हँसी आ गई। मैं तो अपने ही काम से आया हूँ अतः क्षमा का प्रश्न हो कहाँ उठता है? मेरे पास पारस है। मैं आगे कुछ आवश्यक कार्य से जा रहा हूँ।  कहां खो न जाए इसलिए इसे अपने पास रख लो। मैं शाम तक लौटूंगा तब वापस ले लँगा। हाँ, एक बात और, इतना तो तुम जानते ही हो कि पारस के स्पर्श से लोहा स्वर्ण में बदल जाता है। यदि तुम चाहो तो अपनी रापी को स्पर्श कराकर सोने की बना सकते हो।  इसमें मुझे कोई आपत्ति न होगी।' पारस आप शौक से छोड़ जाइए और जब लौटकर आवें तब साथ लेते जाइए। इतना कार्य तो मैं आपका कर सकता हूँ प

पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाएँ।

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                    www.frontknowledge.blogspot.com मनुष्य और पर्यावरण का परस्पर गहरा संबंध है। पर्यावरण यदि प्रदूषित हुआ तो व्यक्ति अस्वस्थ होंगे और जनस्वास्थ्य को शत-प्रतिशत उपलब्ध कर सकना किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा। इसके विपरीत वह यदि सुरक्षित और संरक्षित रहा तो संपूर्ण स्वस्थता के लिए आकाश पाताल के कुलाबे मिलाने की जरूरत न पड़ेगी और थोड़े से प्रयास से ही वांछित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकेगा। इन दिनों संपूर्ण विश्व में समग्र स्वस्थता के प्रति चेतना तो जगी है और उसकी प्रगति के लिए तरह-तरह के उपाय और उपचार भी हो रहे हैं, पर पर्यावरण को बचाए बिना इस प्रकार के प्रयास आधे अधूरे और अधकचरे ही कहे जाएँगे। शरीर खूब स्वच्छ हो और वस्त्र मैले-कुचैले बने रहें तो इसे स्वास्थ्य-संवर्द्धन की दिशा में एकांगी प्रयत्न ही कहना पड़ेगा।  होना यह चाहिए कि स्वास्थ्य-संरक्षण के प्रति जितनी और जिस प्रकार की सतर्कता तथा तत्परता बरती जा रही है, उससे भी कई गुनी अधिक जागरूकता हवा, पानी, मिट्टी की सुरक्षा के प्रति बरती जाने की आवश्यकता है, तभी हम सही अर्थों में उस स्थिति को उपलब्ध कर सकेंगे, जिसे समग्र स्वा

शकुंतला पुत्र भरत

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                    www.frontknowledge.blogspot.com     हमारे देश में दो भरत प्रसिद्ध हैं। एक तो दशरथ पुत्र, कैकेयी सुत भरत तथा दुष्यंत शकुंतला के पुत्र भरत । दोनों ही भरत अपने-अपने उत्तम चरित्र के कारण प्रसिद्ध हुए । यहाँ हम दुष्यंत शकुंतला पुत्र भरत को चर्चा करेंगे । हस्तिनापुर नरेश महाराज दुष्यंत बहुत हो वीर और प्रतापी राजा थे उन्हें शिकार का बहुत शौक था। एक बार वह शिकार खेलते हुए कण्व ऋषि के आश्रम में पहुँच गए। वहाँ उन्होंने शकुंतला को देखा। शकुंतला मेनका नामक अप्सरा से जन्मी ऋषि विश्वामित्र की पुत्री थी। कण्व ऋषि ने उनका पालन-पोषण किया था। वह उनके आश्रम में ही रहती थी ।  दुष्यंत ने शकुंतला से वहीं आश्रम में गंधर्व विवाह कर लिया। ऋषि कण्व उस समय आश्रम में नहीं थे राजा कुछ दिन वहीं रहे। अपने विवाह की निशानी के रूप में उन्होंने शकुंतला को एक अँगूठी भेंट की। राजा ने शकुंतला से यह कहकर विदा ली कि कण्व ऋषि के आश्रम में लौटने पर वह उनसे आजा लेकर उनके पास आ जाए।  कुछ दिन बाद कण्व ऋषि वापस आए तो उन्हें संपूर्ण वृत्तांत सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई और उन्होंने शकुंतला को अपने दो शिष्यों के साथ

विष्णु भक्त ध्रुव की कथा

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                          www.frontknowledge.blogspot.com                 राजा मनु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र उत्तानपाद राजा हुए उत्तानपाद के सुनीति और सुरुचि दो रानियाँ थीं। राजा उत्तानपाद छोटी रानी सुरुचि को अधिक चाहते थे। कालांतर में सुनीति ने ध्रुव को तथा सुरुचि ने उत्तम को जन्म दिया। राजा उत्तम को ही सदा प्यार करते थे। एक दिन राजा सुरुचि के साथ दरबार में बैठे थे। उत्तम उनकी गोद में खेल रहा था उसी समय पाँच वर्ष का बालक ध्रुव खेलता-खेलता वहाँ आ पहुँचा। उसकी इच्छा भी राजा की गोद में बैठने को हुई। राजा ने जानकर भी इस डर से कि कहीं छोटी रानी नाराज न हो जाए, ध्रुव को नहीं  बैठाया। तभी छोटी रानी बोल पड़ी-अगर राजा की गोद में बैठना था तो पिछले जन्म में तपस्या करता और मेरी कोख से ही पैदा होता। अब तू उत्तम के होते कभी सिंहासन पर नहीं बैठ सकता। राजा भी कुछ न बोले। ध्रुव रोता हुआ अपनी माँ के पास चला आया। माँ के पूछने पर उसने सच सच सब बता दिया। (सुनीति बोली-बेटा, रानी ठीक ही कहती है, अगर तूने श्री नारायण की तपस्या की होती तो मेरी कोख से न जन्मता। यदि तू अब भी श्री नारायण की पूजा, तपस्या करे तो

सूर्य की उत्पत्ति का रहस्य

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        सूर्य सौरमंडल का प्रमुख सदस्य है। इसकी उत्पत्ति 46000 मिलियन वर्ष पूर्व सूर्य नेबुला' (नेबुला जो एक धूल तथा गैस का विशाल बादल था) से हुई थी। सूर्य में मुख्यतः हाइड्रोजन गैस है, जो निरन्तर क्रोड में आकर हीलियम में परिवर्तित होती रहती है। इस प्रक्रिया में मुक्त ऊर्जा के कारण सूर्य की सतह का तापक्रम 6000 सेंटीग्रेड हो जाता है।  इनमें से कुछ गैसों की सतह से विस्फोट के कारण तापक्रम 50,000° से. या इससे अधिक तक चला जाता है। इससे सनस्पॉट, कूलर पैच आदि का जन्म होता है। सूर्य के चारों ओर एक पतला वातावरण है, जिसे 'कोरोना' कहते हैं। इसे पूर्ण सूर्यग्रहण के समय देखा जा सकता है। ऐसा अनुमान है कि सूर्य भी अगले 5000 मिलियन वर्ष बाद अन्य तारों की भांति 'लाल दानव' अवस्था में पहुंच जायेगा।  सूर्य की ऊर्जा इसके अंदर स्थित हाइड्रोजन के हीलियम में संलयन ( फ्यूजन) के कारण उत्पन्न होती है। सूर्य का तापक्रम इस प्रक्रिया में 1.4 करोड़ डिग्री सेंटीग्रेड हो जाता है। सूर्य का चमकने वाला स्तर दीप्तिमान स्तर कहलाता है। इसके ऊपर वर्णमंडल होता है। इस वर्णमंडल के पीछे सूर्य का प्रभामंडल युक्

नक्षत्र किसे कहते हैं? जानिए।

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                              नक्षत्र 'अनेक तारों के समूह' को कहा जाता है। आकाश मैं पृथ्वी के चारों ओर तारों के समूह हैं ,जो रात में दिखाई देते हैं पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र को पार कर लेता है। लेकिन  पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करते हुए पार करने में इसे लगभग 14 दिन का समय लगता है।  यही कारण है कि भारतीय पंचांग महीने  मैं 14 दिनों का एक पक्ष शुक्ल  कृष्ण होता है। कुछ प्रमुख नक्षत्रों के नाम हैं :- मेघा,स्वाति, चित्र, हस्त, रेवती, आर्द्रा ,पुनर्वसु आदि पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान अनेक नक्षत्र समूह से होकर गुजरती है ब्रह्मांड में मिश्रित आकृति के अनेक नक्षत्र  समूह  है।  आकृति के अनुसार इनको भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। मछली की आकृति वाले नक्षत्र को 'मीन' तथा तराजू की आकृति वाले नक्षत्र को 'तुला' कहते हैं। भारतीय  ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नक्षत्र समूह को राशि के नाम से जाना जाता है राशियों की संख्या 12 है इनके नाम है :- मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या ,तुला, वृश्चिक ,मकर ,धनु, कुंभ और मीन किसी तारे का जीवन चक्र आकाशगंगा में

शिक्षा का उद्देश्य और जीवन

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                                                  www.frontknowledge.blogspot.com        जिन देशों के पास अपने साधन और आधार नहीं होते, उन्हें बाहर से आयात करने पड़ते हैं। खाड़ी देशों में अपना अन्न-जल नहीं है तो उन्हें वे बाहर से मँगाने पड़ते हैं, पर रूस, अमेरिका जैसे अन्न बाहुल्य वाले देश  भी यदि उन्हें बाहर से मँगाने लगें तो यह आश्चर्य की बात है। शिक्षा के क्षेत्र में भारत की स्थिति ऐसी नहीं है कि उसको शताब्दी पुरानी मैकाले की बताई हुई लीक पर ही चलना पड़े एवं उसके अतिरिक्त और कोई मार्ग  ही नहीं हो।  इस क्षेत्र में भी हमारा कुछ अपना है और वह इतना कमज़ोर नहीं है कि प्राचीनकाल की तरह जगद्गुरु बनने की योग्यता न सही कम- से- कम अपनी निज की सामयिक आवश्यकताएँ तो पूरी कर सकें। क्या पढ़ा जाए? कितना पढ़ा जाए? क्यों पढ़ा जाए? इस प्रश्न के साथ ही यह सवाल भी जुड़ता है कि कौन पढ़ाए और किस प्रकार पढ़ाए? इन प्रश्नों का सही उत्तर समय की माँग है। यदि यह निरीक्षण- परीक्षण किए बिना जो चलता है, उसे ही चलने देने का अपना मानसिक दिवालियापन दिखाया जाएगा तो यह उचित न होगा।  सिद्धान्त- विहीन शिक्षा छात्रों को, उनके अभिभावक

प्रतिकूलताओं का सामना करना सीखें

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                   www.frontknowledge.blogspot.com                                                आवश्यक नहीं है की सदा अनुकूलता ही बनी रहे। जीवन में  प्रतिकूलता का भी स्थान और उपयोग है। यदि सदा सुविधाएँ ही बनी रहें तो व्यक्ति को किसी बड़े पुरुषार्थ की आवश्यकता न पड़ेगी। संघर्ष में पड़ने का कभी अवसर ही न आएगा और इस हेतु जिस सूझ-बूझ का, साहस और धैर्य को अपनाना आवश्यक होता है, उसकी कभी आवश्यकता ही न पड़ेगी। बिना प्रयोग में आये हर वस्तु सड़ती और घटती है। जिन्हें प्रतिकूलताओं का सामना नहीं करना पड़ता, जो सदा सुख- सुविधाओं में ही डूबे रहते हैं, उनकी प्रतिभा पलायन कर जाती है। कठिनाईयों को देखकर वे हतप्रभ हो जाते हैं और तिल को ताड़ बनाकर बेहिसाब घबराते और बेमौत मरते हैं।  माना कि सुविधाओं की अधिकता से जीवनयापन में सुविधाएँ मिलती हैं। उन्नति की दिशा में सरलतापूर्वक अधिक तेजी से चला जा सकता है। इतने पर भी इस स्थिति में एक कमी बनी रहती है कि उत्साह अभिवर्द्धन के लिए जिस प्रबल पराक्रम की आवश्यकता पड़ती है, उसे प्राप्त करने का अवसर ही नहीं मिलता। पौरुष और पराक्रम के दोनों ही स्रोत सूखे पड़े रहते हैं। जिन्ह