शिक्षा का उद्देश्य और जीवन

 

                     

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जिन देशों के पास अपने साधन और आधार नहीं होते, उन्हें बाहर से आयात करने पड़ते हैं। खाड़ी देशों में अपना अन्न-जल नहीं है तो उन्हें वे बाहर से मँगाने पड़ते हैं, पर रूस, अमेरिका जैसे अन्न बाहुल्य वाले देश  भी यदि उन्हें बाहर से मँगाने लगें तो यह आश्चर्य की बात है। शिक्षा के क्षेत्र में भारत की स्थिति ऐसी नहीं है कि उसको शताब्दी पुरानी मैकाले की बताई हुई लीक पर ही चलना पड़े एवं उसके अतिरिक्त और कोई मार्ग  ही नहीं हो। 



इस क्षेत्र में भी हमारा कुछ अपना है और वह इतना कमज़ोर नहीं है कि प्राचीनकाल की तरह जगद्गुरु बनने की योग्यता न सही कम- से- कम अपनी निज की सामयिक आवश्यकताएँ तो पूरी कर सकें। क्या पढ़ा जाए? कितना पढ़ा जाए? क्यों पढ़ा जाए? इस प्रश्न के साथ ही यह सवाल भी जुड़ता है कि कौन पढ़ाए और किस प्रकार पढ़ाए? इन प्रश्नों का सही उत्तर समय की माँग है। यदि यह निरीक्षण- परीक्षण किए बिना जो चलता है, उसे ही चलने देने का अपना मानसिक दिवालियापन दिखाया जाएगा तो यह उचित न होगा।



 सिद्धान्त- विहीन शिक्षा छात्रों को, उनके अभिभावकों और साथ ही पूरे समाज को हैरान करेगी, कर भी रही है। शिक्षा का उद्देश्य यह होना चाहिए कि बच्चे जब जीवनक्षेत्र में प्रवेश करने योग्य हों तो उन्हें स्वावलंबी और सुसंस्कारी विकसित किया जाए।  उन्हें मात्र नौकरी ही एकमात्र अवलंबन न दिखे। उतने छोटे दायरे में ही उनको जीवनयापन करने के लिए नौकरी पर अवलंबित न रहना पड़े। बढ़ती हुई आबादी और बढ़ती हुई शिक्षा संस्थाओं को देखते हुए यह संभव नहीं कि सभी शिक्षितों को नौकरी मिल सके। 



ऐसी दशा में उनके लिए गृह- उद्योगों में लगाए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। कुटीर उद्योगों का एक निश्चित क्षेत्र होना चाहिए,  जिसमें बड़े कारखाने प्रवेश न करने पाएँ, अन्यथा विशालकाय मशीनों की प्रतिस्पर्धा में एक भी कुटीर उद्योग टिक न सकेगा। कच्चा माल देने और बना हुआ लेने, खपाने के लिए सहकारी समितियों को यह दायित्व सौंपा जाना चाहिए। सुसंस्कारिता संवर्द्धन के लिए अलग से प्रयास किया जाए। स्कूलों का वातावरण और अनुशासन ऐसा हो, जिस ढाँचे में ढलकर शिक्षार्थी नीतिवान  और पराक्रमी बनकर निकलें। छात्रों के व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की विधि- व्यवस्था भी हमारे पाठ्यक्रम का अविच्छिन्न अंग होनी चाहिए।



 इस प्रयोजन में शिक्षकों और अभिभावकों का मिला- जुला प्रयास चलना चाहिए, क्योंकि विद्यार्थी को दोनों ही वातावरणों में रहना पड़ता है। वह घर की पाठशाला में भी बहुत कुछ पड़ता है। विशेषतया गुण कर्म स्वभाव का निर्माण तो प्रायः  घरेलु क्षेत्र में  ही होता है। घर और      पाठशाला के संचालकों के बीच ऐसा तालमेल रहना चाहिए कि यदि कहीं कोई दुर्गुण पनप रहा हो तो उसे समय रहते सँभाला जा सके। पाठ्य पुस्तकों में ऐसे विषय हों जो भावी जीवन की समस्याओं का स्वरूप और समाधान समझने में काम आएँ। उनके व्यवहार में उपयोग हो सके। 



इसके लिए वर्तमान और उससे भी अधिक भविष्य संबंधी परिस्थितियों का ज्ञान कराया जाना चाहिए। इतिहास को छोटी- छोटी कहानियों के रूप में संक्षेप में ही पढ़ाया जा सकता है। राजनीतिज्ञों को संसार भर के संविधान और वहाँ  की समस्याओं को जानना चाहिए। विशेषज्ञ बनने वालों के लिए पृथक से एकेडेमियाँ  हों, किन्तु सामान्य स्तर के छात्रों को जिन विषयों से कभी काम नहीं पड़ने वाला है, उनका बोझ उन पर लादने से क्या लाभ? इससे तो कहीं अच्छा यह है कि उन्हें शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक विषयों की ऐसी जानकारी दी जाए, जिसके आधार पर उन्हें भावी जीवन के समाधान में कुछ सहायता मिल सके।



 वह अपने कर्त्तव्यों और अधिकारों की परिधि से भली प्रकार अवगत होकर सुयोग्य नागरिक बन सके। शिक्षा पर खर्च होने वाली राशि एक ओर बढ़ती जाती है। दूसरी ओर अशिक्षितों की गणना भी पहले की अपेक्षा कई गुनी बढ़ रही है। इसका एक कारण जनसंख्या की वृद्धि भी हो सकती है, पर दूसरा उससे भी बड़ा कारण यह है कि कॉलेजों, विश्वविद्यालयों  पर खर्च अधिक हो रहा है, जबकि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के स्कूलों की संख्या बढ़नी चाहिए थी। स्नातक उतने ही बनाए जाएँ, जिनकी भविष्य में आवश्यकता पड़े, जो खप सकें। 



जिन्हें बेरोजगारी का शिकार न बनना पड़े। इस थोड़े से परिवर्तन से शिक्षितों की बेकारी और उसके कारण उत्पन्न होने वाली विभिषिका से सहज ही निपटा जा सकता है। शिक्षकों के लिए इतना ही पर्याप्त न हो कि वे अच्छे नम्बरों से उतीर्ण कराते रहें। उन्हें अधिक वेतन पाने, अधिक ट्यूशन बटोरने की ही फिकर में ही न डूबे रहना चाहिए, वरन यह भी अनुभव करना चाहिए कि वे उस नई पीढ़ी के निर्माता हैं, जिसे अगले दिनों देश की बागडोर संभालनी है। इसके लिए उन्हें पढ़ाने की कला में ही निष्णात नहीं होना चाहिए, वरन इस तथ्य पर भी ध्यान रखना चाहिए कि विद्यालय के वातावरण में उस सुसंस्कारित का भरपूर समावेश हो जो कच्ची आयु के बालकों का स्वभाव एवं व्यक्तित्व उत्कृष्ट बनाने के लिए आवश्यक है।



 इसके लिए अभिभावकों और अध्यापकों का सहयोग एक- दूसरे के प्रयासों में अधिक उत्कृष्टता लाने की भूमिका ठीक प्रकार निभा सकता है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा के साथ- साथ औद्योगिक शिक्षा की ऐसी व्यवस्था हो, जिससे वह कमाई न सही, घरेलू टूट-फुट और शोभा-सज्जा में योगदान दे सके। अपनी दिनचर्या को सुव्यवस्थित रख सके। बालकों को खेलकूद, शारीरिक और मानसिक विकास का भी अवसर मिलना चाहिए। संगीत, व्यक्तित्व जैसे विषयों का पाठय- विषयों में अनिवार्य सम्मिश्रण रहे। इतनी जानकारियों वाले अध्यापकों की तैयारी नए सिरे से करनी होगी।



 अभी तो वे पुस्तकें पढ़ाने, रटाने भर की ड्यूटी पूरी करते हैं। संबद्ध विषयों में उनकी सीधी जानकारी नहीं होती। इसकी समुचित उपलब्धि के लिए अध्यापकों का ट्रेनिंग काल बढ़ाया जाए और उन्हें तभी काम सौंपा जाए, जब वे सर्वतोमुखी प्रतिभासंपन्न होकर छात्रों को परिष्कृत व्यक्तित्व प्रदान करने की योग्यता प्राप्त कर सकें। शिक्षा को एक ढ़र्रे पर चलने वाली फैक्टरी की तरह नहीं चलना चाहिए। आज तो विद्यार्थी कच्चामाल, शिक्षक मजदूर और पाठशाला कारखाने ही होते हैं। छात्र फैक्टरी में विनिर्मित वस्तु की तरह बनकर निकलता है, किन्तु संसार रूपी बाज़ार में कोई उसका खरीददार नहीं होता। 



विदेशों में क्या होता है? इसके लिए आँखें बंद करके अंधानुकरण की आवश्यकता नहीं। उसके पीछे अपने देश की परिस्थिति और संस्कृति का भी समावेश होना चाहिए। जिन समस्याओं का हमें सामना करना पड़ रहा है या अगले दिनों करना पड़ेगा, उनसे निपटने की तैयारी में भी हमारे छात्र आवश्यक जानकारी और तैयारी कर  चुके हैं या नहीं, यह देखना, परखना भी आवश्यक होना चाहिए। वार्षिक परीक्षा में किसी प्रकार उत्तीर्ण होने और प्रमाणपत्र प्राप्त करने की पद्धति में भी भारी परिवर्तन की आवश्यकता है।



 उसमें छात्र के कार्यकाल में जो काम हुआ और जैसा आचरण रहा, उसका निष्कर्ष भी साथ में जुड़ना चाहिए। वार्षिक न होकर परीक्षाएँ मासिक रूप से होती रहें  तो नकल करने-कराने का जो अनाचार चल पड़ा है, उसकी गुंजाइश न रहेगी। इस प्रकार शिक्षण पद्धति में आमूल- चूल परिवर्तन की आवश्यकता है।

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