आदर्श बालक श्रवण कुमार

 

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मातृ देवो भव, पित देवी भव आचार्य देवो भव, यही भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है। आइए हम एक ऐसे बालक के बारे में जानें जिसने इस मंत्र के आधार पर अपना सारा जीवन माता-पिता की सेवा में अर्पित कर दिया । उस बालक का नाम था-श्रवण कुमार श्रवण कुमार राजा दशरथ के अयोध्या राज्य का रहने वाला था उसके पिता का नाम शांतनु तथा माता का नाम भाग्यवती उसके माता-पिता वृद्ध और अंधे थे। 


श्रवण कुमार उनका इकलौता पुत्र या। वह अपने माता-पिता की बड़ी सेवा करता था। वह उन्हें नहलाता, कपड़े बदलता और रोटो बनाकर खिलाता था। वह हर घड़ी उनकी सेवा में हो लुगा रहता था। समय बोलता चला गया (किसी संत ने उसे बताया कि यदि वह अपने माता-पिता को सारे तीर्थ कराकर उनका जल उनकी आँखों से लगाए तो उनकी आँखों की ज्योति वापस आ सकती है) रावण के सामने समस्या यह थी कि वह अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा कैसे कराए? उस समय आजकल को तरह आवागमन की सुविधा नहीं थी। 


उसने एक वहंगी (कांवर) बनाई और एक-एक पलड़े में माता-पिता को बैठाकर तीर्थयात्रा को निकल पड़ा। अनेक देशों का भ्रमण कर वह अपने अंधे माता-पिता की आँखों की ज्योति वापस आने की कामना करता । अनेक पवित्र नदियों का जल उनकी आँखों में लगाता । जंगल, पहाड, नदी, नाले पार करता हुआ, वह जहाँ रुकता, अपने माता-पिता को विश्राम कराकर ही सोता अंत में वह अपने नगर अयोध्या वापस लौटते समय सरयू नदी के पास से जा रहा था। 


आवण के माता-पिता ने पानी की इच्छा प्रकट को। प्रात:काल का समय था। उसने नदी के पास ही अपनी काँवर टिकाई और जल लेने के लिए जलपात्र लेकर चल दिया। जैसे ही श्रवण ने जल लेने के लिए जलपात्र नदी में डुबाया इब-डब को आवाज हुई। यह आवाज पास के जंगल में एक आखेटक ने सुनी, उसने किसी जानवर की आवाज समझकर अपना शब्दभेदी बाण चला दिया। वह अटक और कोई नहीं अयोध्या के राजा दशरथ थे। 


वे बाण चलाने की कला में निपुण थे। वे शब्द या आहट सुनकर लक्ष्य भेदने में कुशल थे। वह बाण श्रवण कुमार को आकर लगा। श्रवण कुमार हाय कहता हुआ, वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा। जब राजा उस जगह पहुँचे तो उन्होंने देखा कि उनके बाण से एक तड़का घायल होकर पड़ा है। वह कराह रहा था चोट गहरौं थी। यह देखकर राजा को बड़ा दुःख हुआ। राजा ने अपने हाथ से उसके शरीर से तोर निकाला।


 आखेटक ने बालक से उसका परिचय पूछा । बालक इतना ही कह पाया कि वह एक ब्राह्मण कुमार है। पास ही उसके माता-पिता हैं, वे अंधे हैं। उन्हें प्यास लग रही है। कृपया उन्हें जल पिला दो। वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। इतना कहकर उसने प्राण त्याग दिए। राजा दशरथ श्रवण के माता-पिता के पास जल लेकर गए और उन्हें सारी घटना बताकर जल पीने का आग्रह करने लगे।


 राजा दशरथ की बात सुनकर माता-पिता पुत्र- मोह में व्याकुल हो उठे और दुखी मन से राजा को शाप दे दिया कि जिस प्रकार हम पुत्र- वियोग में अपने प्राण त्याग रहे हैं, उसी प्रकार तुम भी पुत्र-वियोग में अपने प्राण त्यागोगे। राजा दशरथ ने उनसे क्षमा मांगते हुए कहा कि उनसे अनजाने में ही यह अपराध हुआ है किंतु अब क्या हो सकती था? इस शाप के कारण राजा दशरथ को पुत्र-वियोग में अपने प्राण त्यागने पड़े।




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