देवभाषा संस्कृत का महत्व

 

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देवभाषा का दर्जा प्राप्त संस्कृत का पूरे भारतीय समाज के साथ सांस्कृतिक संबंध है। विद्वानों का मानना है कि इसका आरंभ 1500 से 1200 ई. पृ. खोजा जा सकता है। यह काल पू. ऋग्वैदिक काव्यों का काल है। दरअसल हमारे यहाँ श्रुति और स्मृति की लंबी परंपरा रही है। ऐसे में इस भाषा का उद्भव व विकास खोजना इतना आसान नहीं रहा। 


वैसे वैदिक काल में वेदों के पवित्र श्लोक, मंत्र तथा ऋचाएं मिलती हैं। फिर इसी दौर में धार्मिक अनुष्ठानों, मंत्रों आदि की भी भरपूर रचना हुई। पुराण, आरण्यक, उपनिषद् आदि इसी काल की रचनाएं हैं। वैसे संस्कृत का वास्तविक इतिहास पाणिनी (5वीं सदी) के काल से माना जाता है। इसी दौरान वेदान्त की रचना हुई। पाणिनी ने तो खैर 'अष्टाध्यायी' लिखा ही।


 पिंगल छंद भी इसी दौर में रचे गये। इसके बाद लौकिक संस्कृत का अभ्युदय हुआ। आख्यायिकाएं, प्रशस्तिकाव्य, वाल्मीकि का रामायण, व्यास का महाभारत इसी काल की रचनाएं मानी जाती हैं। महाभारत का काल ईसा पूर्व 1000 वर्ष माना जाता है। इसी दौरान देश के करोड़ों लोगों की प्रेरणास्त्रोत रही 'गीता' की भी रचना हुई।


 क्षेमेन्द्र की 'वृहत्कथामंजरी' भी इसी युग की देन है। पंचतंत्र का रचनाकाल चौथी सदी है, इसी दौरान अश्वघोष का बुद्धचरित और सौदरानंद का बौद्धमहाकाव्य की रचना हुई। कालिदास की मेघदूतम्, कुमार संभवम्, रघुवंश महाकाव्यं जैसी काव्य कृतियां आज भी विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर बनी हुई हैं। वहीं उनका नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम् दुनियाभर में अपनी विशेषता के कारण आज भी आदर पा रहा है।


 मालविकाग्निमित्र और विक्रमोर्वशीयम कालिदास के अन्य नाटक हैं। कालिदास के बाद भारवि (6वीं सदी), भट्टी (7वीं सदी) और कुमारदास तथा माघ (8वीं सदी) की रचनाएं आयीं। संस्कृत में कालिदास से पहले ही अश्वघोष (दूसरी सदी) ने नाट्यलेखन की परंपरा शुरू कर दी थी। इसमें महत्वपूर्ण योगदान भास का है, जिनके अब तक 13 नाटक उपलब्ध हैं।


 'प्रतियोगन्धरायण' और 'प्रतिभानाटकम्' उनकी श्रेष्ठ नाट्य कृतियां हैं। परवर्तीकाल में शूद्रक का भी नाम महान नाटककार के रूप में ख्यात है। उनका 'मृच्छकटिकम्' आज भी आदर पा रहा है। इस परंपरा के अन्य नाटककार हैं- विशाखदत्त, हर्ष, भवभूति, कृष्णमित्र, बोधायन, राजशेखर आदि। इसी दौर की प्रमुख कृतियां हैं-कादम्बरी और हर्षचरित।


 अपनी लालित्यपूर्ण शैली के लिए बाणभट्ट की ये कृतियां विश्व साहित्य की धरोहर हैं। संस्कृत में तकनीकी एवं दार्शनिक साहित्य भी खूब लिखा गया है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र न सिर्फ राजनीति, बल्कि समाज एवं अर्थव्यवस्था को भी समझने में मदद देता है। आयुर्वेद की रसराज महोदधि, चरकसंहिता, सुश्रुत संहिता, योग रत्नाकर आदि रचनाएं संस्कृत में ही हैं।


 आर्यभट्ट का बीजगणित, भाष्कराचार्य का लीलावती जैसी गणित प्रधान पुस्तकें भी संस्कृत में ही हुई हैं। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र, दंडी का काव्यालंकार, आनंदवर्धन का रीतिशास्त्र इसी दौर में रची गयीं। कुंतक, वामन, अभिनवगुप्त आदि ने भी अपनी तरह से रस, छंद, अलंकार, वक्रोक्ति, ध्वनि, औचित्य आदि पर विचार किया है।

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