परिश्रम की कमाई में आस्थावान रैदास

 

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भक्त रैदास के बारे में एक किंवदंती इस प्रकार है:-  रैदास फटे जूते की सिलाई में ऐसे तल्लीन थे कि सामने कौन खड़ा है, इसका उन्हें पता न चला। आगंतुक भी कब तक प्रतीक्षा करता, उसने खाँसकर रैदास का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। रैदास ने दृष्टि ऊपर उठाई। 


सामने एक भद्र पुरुष को प्रतीक्षारत देख वह हड़बड़ा कर खड़े हो गए और विनय शब्दों में बोले-'क्षमा कीजिए मेरा ध्यान काम में था। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? क्षमा की बात सुनते ही आगंतुक को हँसी आ गई। मैं तो अपने ही काम से आया हूँ अतः क्षमा का प्रश्न हो कहाँ उठता है? मेरे पास पारस है। मैं आगे कुछ आवश्यक कार्य से जा रहा हूँ।


 कहां खो न जाए इसलिए इसे अपने पास रख लो। मैं शाम तक लौटूंगा तब वापस ले लँगा। हाँ, एक बात और, इतना तो तुम जानते ही हो कि पारस के स्पर्श से लोहा स्वर्ण में बदल जाता है। यदि तुम चाहो तो अपनी रापी को स्पर्श कराकर सोने की बना सकते हो।


 इसमें मुझे कोई आपत्ति न होगी।' पारस आप शौक से छोड़ जाइए और जब लौटकर आवें तब साथ लेते जाइए। इतना कार्य तो मैं आपका कर सकता हूँ पर दूसरी आज्ञा मानने के लिए मैं तैयार नहीं हूँ। मैं ठहरा चमार। मरे पशुओं की खाल को साफ करता हूँ फिर उसे काटकर जूते बनाता हूँ।


 इस काम में कड़ी धातु के औजार की ही आवश्यकता पडती है। सोना नरम होता है। यदि उसकी राँपी बनाऊँगा तो एक ही झटके में मुड़ जाएगी और दिन भर की मजदूरी से चंचित रह जाऊँगा। सोने की बेचकर तो तुम दैनिक जीवन के उपयोग की अनेक वस्तुएँ खरीद सकते हो। 


फिर सड़क के किनारे बैठकर इस घंटे को करने की भी आवश्यकता न रहेगी। कोई भी इज्जतदार व्यवसाय की शुरुआत कर सकते हो। आगंतुक ने पुनः अपने आग्रह को दोहराया। यह आगंतुक कोई साधारण व्यक्ति नहीं वरन देवराज इंद्र थे। दीर्घकाल से वह रैदास की आदर्श भक्ति और निर्लोभी स्वभाव के संबंध में अनेक चर्चाएं सुनते आ रहे थे। 


आज उनकी इच्छ हुई कि ऐसे भक्त के दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त किया जाए। वे वेष बदल कर उनकी परीक्षा लेने ही आए थे। रैदास ने पारस लौटाते हुए स्पष्ट शब्दों में कह दिया-'महोदय! मैं ईमानदारी और परित्रम की कमाई में हो विश्वास करता हूँ। सुबह से शाम तक किए गए कर्मों के बदले जो पारिश्रमिक मिलता है वही मेरे लिए पर्याप्त है।


 इस प्रकार अनुदान में मिली कोई वस्तु मुझे स्वीकार नहीं।' अब इंद्र क्या कहते ? पारस वापस ले लिया और मन ही मन भक्त के निर्लोभी स्वभाव की सराहना करते हुए लौट गए। भक्ति और आस्तिकता ईश्वर पर निर्भरता तो लाती है, परंतु व्यक्ति की परिश्रम और पुरुषार्थ से निष्ठा छीनती नहीं, उसे सुदृढ़ ही बनाती है। 


प्रायः देखा जाता है कि आलसी और अकर्मण्य लेग ईश्वर भक्ति का बाना पहनकर अपने भोजन और निर्वाह की आवश्यकताएँ भी ईश्वर से पूरी होने की आशा करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को ईश्वर का प्रवंचक ही कहा जाएगा। ईश्वर के प्रति विश्वास, लौकिक जीवन में भी पुरुषार्थवादी और श्रमशील बनाता है।


 दूसरे निर्लिप्त भक्ति भी रैदास के आदर्श द्वारा व्यक्त होती है जो यह प्रतिपादित करती है कि सच्चे ईश्वर भक्त को अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ के बल पर जो मिले उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। मुफ्त के बिना परिश्रम से अनायास ही आ उपस्थित हुए लाभों की उसे न आवश्यकता होती है और न अपेक्षा रहती है। 

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