शकुंतला पुत्र भरत


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हमारे देश में दो भरत प्रसिद्ध हैं। एक तो दशरथ पुत्र, कैकेयी सुत भरत तथा दुष्यंत शकुंतला के पुत्र भरत । दोनों ही भरत अपने-अपने उत्तम चरित्र के कारण प्रसिद्ध हुए । यहाँ हम दुष्यंत शकुंतला पुत्र भरत को चर्चा करेंगे ।


हस्तिनापुर नरेश महाराज दुष्यंत बहुत हो वीर और प्रतापी राजा थे उन्हें शिकार का बहुत शौक था। एक बार वह शिकार खेलते हुए कण्व ऋषि के आश्रम में पहुँच गए। वहाँ उन्होंने शकुंतला को देखा। शकुंतला मेनका नामक अप्सरा से जन्मी ऋषि विश्वामित्र की पुत्री थी। कण्व ऋषि ने उनका पालन-पोषण किया था। वह उनके आश्रम में ही रहती थी । 


दुष्यंत ने शकुंतला से वहीं आश्रम में गंधर्व विवाह कर लिया। ऋषि कण्व उस समय आश्रम में नहीं थे राजा कुछ दिन वहीं रहे। अपने विवाह की निशानी के रूप में उन्होंने शकुंतला को एक अँगूठी भेंट की। राजा ने शकुंतला से यह कहकर विदा ली कि कण्व ऋषि के आश्रम में लौटने पर वह उनसे आजा लेकर उनके पास आ जाए। 


कुछ दिन बाद कण्व ऋषि वापस आए तो उन्हें संपूर्ण वृत्तांत सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई और उन्होंने शकुंतला को अपने दो शिष्यों के साथ राजा दुष्यंत के पास भेज दिया। दुष्यंत ने उसे पहचानने से मना कर दिया। शकुंतला को भेंटस्वरूप राजा दुष्यंत की दी हुई अँगूठी पानी में गिर गई थी । अंगूठी के बिना राजा शकुंतला को पहचान न सके। वह कण्व आश्रम में आ गई।


आश्रम में शकुंतला ने भरत को जन्म दिया भरत बचपन से ही बहादुर था। वह वन में हिंसक पशुओं के साथ खेलता था। बड़े खूंखार शेरों की सवारी करता था (सिंह-शावकों के दाँत गिनता था। इसी कारण वहाँ के सभी आश्रमवासी उसे सर्वदमन कहकर पुकारते थे।


एक दिन दुष्यंत को एक मछुआरे ने एक अंगूठी दी। अँगूठी देखते ही राजा को शकुंतला की याद आई। वह शकुंतला को खोज में निकल पड़े । संयोग से वह उसी आश्रम में पहुँच गए जहाँ भरत शेर के बच्चे के साथ खेल रहा था।


 दुष्यंत ने इससे पूर्व ऐसा तेजवान और बलशाली बालक कभी नहीं देखा था। दुष्यंत ने बालक से उसके माता-पिता का नाम पूछा। तभी शकुंतला वहाँ आ पहुँची । राजा दुष्यंत, शकुंतला और भरत को हस्तिनापुर ले आए।दुष्यंत के बाद भरत राजा बने । अनेक यज्ञादि किए, उन्हें चक्रवर्ती सम्राट बनने का गौरव प्राप्त हुआ। उनके नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा।



आदर्श बालक श्रवण कुमार

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