महाद्वीपों एवं महासागरों की उत्पत्ति का रहस्य

 

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महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों-भूगर्भशास्त्रियों में मतान्तर रहा है। इस सम्बन्ध में सामने आये प्रमुख सिद्धांतों का विवरण निम्नवत है:---  (संकुचन पर आधारित सिद्धान्त):--.  कई वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की उत्पत्ति ऊष्ण-तरल पदार्थों के रूप में हुई, जो धीरे-धीरे ठोस में परिवर्तित हो चुकी है या हो रही है।


 इस प्रक्रिया द्वारा पृथ्वी का बाह्यतम भाग सबसे पहले ठण्डा हुआ, उसके बाद आन्तरिक भाग धीरे-धीरे ठण्डा हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप बाह्य भाग का आंतरिक भाग पर दबाव पड़ा, जिससे पृथ्वी के विभिन्न भागों में कहीं उभार तथा कहीं धंसाव की प्रक्रिया होती रही, जिसके फलस्वरूप महासागरों तथा महाद्वीपों का निर्माण हुआ। 


ऊँचा भाग महाद्वीप तथा धंसा भाग महासागर (जलाच्छादित) कहलाया। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन लॉर्ड केलविन, सोलास, लेपवर्थ जैसे भू-वैज्ञानिकों ने किया। परन्तु इस परिकल्पना को मान्यता नहीं दी गयी। इसके बाद ग्रीन की चतुष्फलक परिकल्पना प्रकाश में आयी, जिसको इन्होंने 1875 में प्रस्तुत किया। 


इसके अनुसार पृथ्वी अति गर्म तरल अवस्था में है, जो क्रमश: ठंडी हो रही है। आरंभ में पृथ्वी की भूपर्पटी के बाद जब उसका आंतरिक भाग शीतल होने लगा तो उसमें संकुचन के कारण बाह्य तथा आंतरिक भाग में अंतर उत्पन्न हो गया, जिससे पृथ्वी के चतुष्फलक के रूप में आते समय उसकी ऊपरी परत नीचे बैठने लगी। 


अत: जल तथा स्थल भाग का निर्माण हुआ, क्योंकि इसके सपाट भाग किनारे वाले भागों से मीचे थे। चतुष्फलक का शीर्ष दक्षिण की ओर तथा आधार उत्तर की ओर बना।



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