पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाएँ।

 

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मनुष्य और पर्यावरण का परस्पर गहरा संबंध है। पर्यावरण यदि प्रदूषित हुआ तो व्यक्ति अस्वस्थ होंगे और जनस्वास्थ्य को शत-प्रतिशत उपलब्ध कर सकना किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा। इसके विपरीत वह यदि सुरक्षित और संरक्षित रहा तो संपूर्ण स्वस्थता के लिए आकाश पाताल के कुलाबे मिलाने की जरूरत न पड़ेगी और थोड़े से प्रयास से ही वांछित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकेगा।


इन दिनों संपूर्ण विश्व में समग्र स्वस्थता के प्रति चेतना तो जगी है और उसकी प्रगति के लिए तरह-तरह के उपाय और उपचार भी हो रहे हैं, पर पर्यावरण को बचाए बिना इस प्रकार के प्रयास आधे अधूरे और अधकचरे ही कहे जाएँगे। शरीर खूब स्वच्छ हो और वस्त्र मैले-कुचैले बने रहें तो इसे स्वास्थ्य-संवर्द्धन की दिशा में एकांगी प्रयत्न ही कहना पड़ेगा।


 होना यह चाहिए कि स्वास्थ्य-संरक्षण के प्रति जितनी और जिस प्रकार की सतर्कता तथा तत्परता बरती जा रही है, उससे भी कई गुनी अधिक जागरूकता हवा, पानी, मिट्टी की सुरक्षा के प्रति बरती जाने की आवश्यकता है, तभी हम सही अर्थों में उस स्थिति को उपलब्ध कर सकेंगे, जिसे समग्र स्वास्थ्य की संज्ञा दी जा सके।


गाय का बच्चा जब तक धीमी गति से नियम-कायदे के अनुरूप दूध पीता रहता है, तब तक गाय उसे पेट भर पीने देती है और दुलार से चाटती रहती है, पर जब वह उद्दंडता पर उतरता है और थन काटकर उन्हें लहूलुहान करने लगता है तो माता के तेवर बदलते हैं और वह करारी लात जमाकर दूर धकेल देती है। एक पक्ष का व्यवहार बदलते ही दूसरा पक्ष अपने तौर-तरीके देखते-देखते बदल लेता है।


प्रकृति हमारी माता है। उसी के अजस्र अनुदानों के कारण शरीर के ढाँचे से लेकर मानसिक विकास तक के जीवन को समुन्नत बनाने वाली अनेकानेक उपलब्धियाँ हस्तगत हुई हैं। निर्वाह से लेकर लोक सुविधा के साधनों का भंडार उसी की खदान से हाथ लगा है। जिस पर गर्व किया और अहंकार जताया जाता है, वह समस्त साधन-सामग्री प्रकृति । का अनुदान भर है। इसे सीमित मात्रा में लिया और भलेमानस की तरह सदुपयोग में लाया जाए तो। सामान्यक्रम ठीक तरह चलता रहता है।


 मनुष्य को भी कुछ कमी नहीं रहती और प्रकृति-संतुलन भी बिगड़ता नहीं। अदृश्य जगत में विक्षोभ भी उत्पन नहीं होता, पर जब अतिवादी उद्दंडता अपनई। जाती है और एक सोने का अंडा रोज देने वाली मुर्गी का पेट चीरकर देखते-देखते स्वर्ण भंडार हथिया लेने की ललक उठती है तो उसका पेट चीरा जाता है और वह भी गँवा बैठा जाता है जो सहज सरलतापूर्वक मिलता चला आता था। यहाँ अनौचित्य इन दिनों प्रकृति के साथ मनुष्य द्वारा अपनाया जा रहा है।


द्रुतगामी वाहनों और कारखानों के लिए तेल, कोयला जैसी खनिज ऊर्जा का दोहन असाधारण गति से हो रहा है। फलतः वायुमंडल में प्रदूषण तो भरता । ही है, साथ ही वह संचित भंडार भी चुकता चला जाता है, जो भूगर्भ में चिर संचय के रूप में जमा था। इस व्यतिक्रम से भूकंपों एवं अन्यान्य प्रकृति-प्रकोपों का सिलसिला बढ़ा है और वह स्थिति समीप आतो. जा रही है कि इस शताब्दी के भीतर वह संचय समाप्त हो जाएगा और कारखानों, द्रुतवाहनों के समक्ष  ऊर्जा के अभाव में कबाडखाने मात्र बन जाने की। विभीषिका सामने आ खड़ी होगी। 


मदिराजन्य उन्माद प्रसिद्ध है। उसकी अति मात्रा । लेने पर मनुष्य नालियों में मुँह रंगड़ता, अनर्गल वचन बोलता और बादलों जैसी हरकतें करता है। दूसरा नशा सफलताजन्य अहंकार का है, जो उसे पचा र पाते, वे उद्दंडता का अनाचार अपनाते हैं। शरीर  में बलिष्ठता आने पर गुंडागर्दी सूझती है। पैसा बढ़ने पर दुर्व्यसनों की भीड़ दौड़ पड़ती है।


 अहं बढ़ने पर लोग दबाने-ठगने की बात सोचते हैं। प्रकृति की परतों को असाधारण रूप से उधेड़ने में यत्किंचित सफलता मिल जाने पर भी यही हो रहा है। विज्ञान को अणुबम, रासायनिक बम बनाने की सूझी। विश्व विजय के सपने देखने वालों की पूरी चांडाल चौकड़ी जम गई। सर्वसाधारण भी अनुकरण में पीछे कैसे रहता? उसने अपना रहन-सहन, आहार-विहार ऐसा अपनाया, जिसे एक प्रकार से मुँह चिढ़ाना ही कहा जा सकता।


एयर कंडीशंड कमरों में रहने वाले तात्कालिक मौज तो उठाते हैं, पर शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बुरी तरह गँवा बैठते हैं और आएदिन जुकाम जैसी बीमारियों के शिकार बने रहते हैं। पकवान, मिष्ठान्न, मांस, व्यंजन जैसे स्वादों से स्वादिष्टता तो मिली, पर पेट का कचूमर निकल गया और तज्जनित रक्त-विकारों से अनेकानेक बीमारियों की झड़ी लग गई यह चटोरेपन की प्रतिक्रिया है।


 धन-लिप्सा ने कमाई के ऐसे तरीके ढूँढ निकाले, जिनसे ढेरों संपदा कुछ हो समय में जमा कर लेने की ललक ने ऐसा अनाचारों का ढेर लगा दिया, जिसमें प्रयोक्ता को तो मनमाना लाभ हुआ, पर अन्य असंख्यों को उस कुचक्र में पिसकर कंकाल भर रह जाना पड़ा। विनोद, मनोरंजन के नाम पर कामुकता, छद्म, आक्रमण और शोषण के दृश्य देखने को मिले। 


फलतः आँखों को रस जरूर आया, पर चिंतन और चरित्र में निकृष्टता का दौर बढ़ता चला गया। सोचा गया कि नियंता की प्रकृति की कोई व्यवस्था तो है नहीं, फिर संकीर्ण स्वार्थ की पूर्ति के लिए कुछ भी कर गुजरने में क्या हर्ज है, इसी ढीठता के अंतर्गत पेड़ बुरी तरह कटे और प्राणियों को घास-पात की तरह उदरस्थ कर जाने की प्रथा चल पड़ी।


 कृत्रिम खाद, कीटनाशक, कृत्रिम प्रजनन आदि से किसी को तात्कालिक लाभ भले ही मिले, पर प्रतिफल रूप में हो रहे पर्यावरण विकृति के दूरगामी परिणाम हानिकारक ही हो सकते हैं।

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