माता के आभूषण

          

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उन्नीसवीं शताब्दी अपनी अंतिम साँसें गिन रही थी और गिन रहा था अपने जीवन के आखिरी साल एक वयोवृद्ध बंगाली । नाम था उसका ठाकुरदास और परिवार में केवल एक बच्चा तथा पत्नी थे। इस सीमित परिवार का भरण-पोषण भी ठीक प्रकार से न हो पाता था। ठाकुरदास दो रुपये माहवार की नौकरी करते थे और उसी से अपने परिवार का गुजारा तथा लड़के का खरच चलाते थे।


 पहले तो ठाकुरदास को कलकत्ता की गलियों और सड़कों पर भटकना पड़ा। कभी भोजन का प्रबंध हो जाता था, कभी दोनों वक्त का और कभी-कभी एक ही वक्त का ऐसे भी कई अवसर आए थे जबकि घर में किसी के मुँह में एक रोटी तो दूर एक दाना भी नहीं पहुँच पाया। माँ व्यथित, पिता परेशान और पुत्र का भविष्य अनिश्चित।


 आशा की एक ही किरण थी, कभी तो भगवान सुनेगा और अभी वह किरण उदित होने का समय नहीं आया था शायद। लेकिन फिर भी बड़े धैर्य के साथ दोनों पति-पत्नी प्रतीक्षा कर रहे थे। पुत्र तो अभी समझने लायक भी नहीं था। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई तो नियति ने उन्हें मेदिनीपुर जिले के एक गाँव में ला पटका। 


वहाँ ठाकुरदास को दो रुपये माहवार की नौकरी मिली। कुछ भी नहीं तो उससे यह थोड़ा ही अच्छा-यह भाव भी नहीं आया। आया परिवार में एक उत्सव का सा उल्लास और माता-पिता तथा पुत्र तीनों को यह लगा कि अभी नहीं तो कभी भी किरण फेंकने वाला सूरज भी उगेगा। 


कब ? यह तो कुछ निश्चित नहीं था, पर कभी तो उगेगा ही, इस पर जैसे तीनों को पूरा विश्वास था। इसी उल्लास में बरसों बीत गए और एक दिन रात के समय बेटे ने अपनी माँ के पैर दबाते हुए पूछा-'माँ! मेरी इच्छा है कि मैं पढ़-लिखकर बहुत बड़ा विद्वान बनूँ और तुम्हारी खूब सेवा करूं।' पूछ। कैसी सेवा करेगा।' बेटा पढ़ने लगा था इसलिए कुछ मन बहलाते हुए प्रोत्साहन के स्वर में माँ ने पूछा 'माँ! तुमने बड़ी तकलीफ में दिन गुजारे हैं।


 मैं तुम्हें अच्छा-अच्छा खाना खिलाऊँगा और बढ़िया कपड़े लाऊँगा, हाँ'-बेटे को जैसे कुछ याद आया-'तुम्हारे लिए गहने भी बनवाऊँगा।' हाँ बेटा! तू जरूर सेवा करेगा मेरी'-माँ बोली-'पर गहने मेरी पसंद के ही बनवाना।' 'कौन से गहने माँ।" 'मुझे तीन गहनों की बड़ी चाह है'-माँ ने बताया और गहनों के विवरण देने लगी-'पहला गहना तो यह है कि इस गाँव में कोई अच्छा स्कूल नहीं है। तुम एक स्कूल बनवाना।


 और यहाँ दवाखाने की कमी है तुम एक दवाखाना भी खुलवाना तथा तीसरा गहना यह है कि गरीब एवं अनाथ बच्चों के लिए रहने-खाने तथा शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था करना।


बेटे ने भावाभिभूत होकर माँ के चरणों में मस्तक रख दिया और तभी से उसे कुछ ऐसो धुन सवार हुई कि वह अपनी माँ के लिए ये तोन गहने बनवाने हेतु जी-तोड़ मेहनत करने लगा । खूब पढ़ा-लिखा और विद्वान बन गया तथा कई एक महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त होकर काम भी किया जिनके वेतन में अच्छी-खासी रकम मिलती थी।


 पर उसे अपनी माँ के इन तीन गहनों का सदैव ध्यान रहा और वह बराबर स्कूल, औषधालय तथा सहायता केन्द्र खोलता चला गया। यही नहीं आगे चलकर स्त्री शिक्षा तथा विधवा विवाह के गहने भी अपनी माँ को चढ़ाए। इन असाधारण गहनों को आजीवन बनवाते रहने वाला यह महामानव और कोई नहीं, पं. ईश्वरचंद्र विद्यासागर ही थे।



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