संघर्ष से घबराएँ नहीं - सफलता चरण चूमेगी

 

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अमेरिका का प्रसिद्ध नगर शिकागो, सरदी के दिन, व्यस्त राजमार्ग पर भी बहुत कम चहल-पहल नजर आ रही थी। जितने अमेरिकी सड़क पर गुजरते हुए दिखाई भी देते, वे लंबा ऊनी कोट पहने और कैप लगाए थे। होटल और रेस्ट्रा खचाखच भरे थे। लोग गरम चीजें खा-पीकर अपनी ठंढ को भुलाने का प्रयास कर रहे थे।


 ऐसी ठंड में एक भारतीय संन्यासी बोस्टन से आने वाली रेलगाड़ी से शिकागो स्टेशन पर उतरा । कपड़े गेरुए रंग के थे। सिर पर पगड़ी बँधी थी, जिसका रंग भी गेरुआ ही था विचित्र वेशभूषा को देखकर अनेक यात्रियों की दृष्टि उस पर जम गई। वह फाटक पर पहुँचा। लंबे चोंगे की जेब से टिकिट निकाला और टिकिट कलेक्टर को देकर वह प्लेटफार्म से बाहर आ गया।


 उसे देखने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। भीड़ में से ही किसी ने पूछ लिया- 'आप कहाँ से आए हैं?' बोस्टन से, पर निवासी भारत का हूँ। यहाँ किससे मिलना है। डॉक्टर बैरोज से। 'कौन डॉक्टर बैरोज। 'संन्यासी ने अपने चोंगे की जेब में हाथ डाला पर हाथ खाली ही निकला। 'क्यों? क्या हुआ ?' 'मैं डॉक्टर बैरोज के नाम बोस्टन से प्रोफेसर जे. एच. राइट का पत्र लाया था, उस पर पता लिखा था, पर वह कहीं रास्ते में गुम गया। 


दर्शक उसकी बात को सुनकर हँसने लगे। भीड़ धीरे-धीरे छैटने लगी। संन्यासी अब अकेला रह गया था। पास से निकलने वाले एक शिक्षित व्यक्ति को रोककर संन्यासी ने पूछा- क्या आप मुझे डॉ. बैरोज का पता बता सकते हैं? वह अनसुनी करके अपनी आँखें मटकाता हुआ आगे बढ़ गया। संन्यासी स्टेशन की सीमा को पार कर राजमार्ग पर चलने लगा। 


उसकी दृष्टि दोनों ओर लगे साइन बोर्डों पर थी। शायद इन्हीं के बीच कहीं डॉ. बैरोज का भी बोर्ड दिखाई दे जाए। इतने में ही स्कूल से छूटे बच्चों के एक समूह ने उसे घेर लिया। बच्चों ने ऐसी रंगीन वेशभूषा वाला संन्यासी कभी देखा न था। आगे-आगे संन्यासी और पीछे पीछे बच्चे शोर मचाते हुए चले जा रहे थे। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते शाम हो गई।


 बिना पूरे पते के इतने बड़े शहर में किसी व्यक्ति से मिलना आसान कार्य न था। ठंढ बढ़ने लगी। शीत लहर चलने लगी। संन्यासी के पास गरम कपड़े तो थे नहीं। उसने दो दिन से भोजन भी नहीं किया था पास में एक भी पैसा नहीं। सोचा था शिकागो पहुँचकर वह डॉ. बैरोज का अतिथि बनेगा। पर कभी-कभी सोचा हुआ काम कहाँ हो पाता है? उसे सामने एक बहुत बड़ा होटल दिखाई दिया। केवल रात काटनी थी। 


उसने होटल की ओर कदम बढ़ाए। सीढ़ियों पर चढ़ना था कि दरबान ने रोक दिया-'तुम कौन हो?' 'मैं रात्रि में यहाँ विश्राम करना चाहता हूँ। 'नीग्रो लोगों के ठहरने के लिए इस होटल में स्थान नहीं है।' 'मैं भारतीय हूँ।'  तुम काले हो। काले लोगों के लिए इस होटल में स्थान नहीं'- दरबान ने बड़ी बेरुखी से कहा। 


संन्यासी के बढ़े हुए चरण पुनः सड़क की ओर अनमने भाव से बढ़ने लगे। बरफ गिरने लगी। भूखा संन्यासी काँपने लगा। उसे लगा कि अब आगे एक कदम भी चलना मुश्किल है। आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। यदि वह आगे बढ़ा तो जमीन पर गिर जाएगा। पर क्या करता ? आगे बढ़ना ही तो उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था।


 उसने देखा वह रेलवे माल गोदाम के पास आ गया है। उसी तरफ बढ़ता चला गया गोदाम बंद हो चुका था। बाहर लकड़ी का एक पैकिंग बॉक्स रखा था। पास जाकर देखा। बाँक्स खाली था। अंदर थोड़ी सी घास पड़ी थी। ऊपर ढक्कन रखा हुआ था। भोजन की तो कोई व्यवस्था हो न पाई पर ठंढ से अपने शरीर की रक्षा तो करनी ही थी। 


वह अंदर की घास को एक तरफ करके उसमें उतर गया, ऊपर से ढक्कन खिसका लिया। रात भर बरफीली हवा चलती रही। हवा जब तख्तों की सैंदों से अंदर प्रवेश करती तो संन्यासी काँप जाता था। जैसे-तैसे रात कट गयी। बॉक्स से संन्यासी बाहर निकला। शरीर सुन्न पड़ गया था।


 सड़क के एक किनारे पर बैठ गया और पूर्ण रूप से अपने को भगवत् इच्छा पर छोड़ दिया। अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक संन्यासी हाथ फैलाने से तो रहा। वह जहाँ बैठे थे, उसके सामने के भवन का द्वार खुला। एक सुंदर स्त्री बाहर निकलो। वह संन्यासी के पास आई और पूछने लगी-'स्वामी जी! यहाँ जो सर्व धर्म सम्मेलन होने जा रहा है, क्या आप उसमें भाग लेने पधारे हैं? आपका परिचय क्या है?'  'मेरा नाम विवेकानंद है। मैं भारत से इस सम्मेलन में भाग लेने आया हूँ।


 मुझे बोस्टन से डॉक्टर बैरोज के नाम प्रोफेसर जे.एच.राइट ने एक पत्र दिया था। वह कहीं गुम गया। मेरे पास तो कोई परिचय पत्र भी नहीं है। वह महिला स्वामी जी को बड़े सम्मान के साथ अपने घर ले गई। वहाँ उसने संन्यासी के लिए भोजन, गरम कपड़ों तथा निवास की पूरी-पूरी व्यवस्था की। दूसरे दिन सर्व धर्म सम्मेलन के कार्यालय में जाकर परिचय कराया।


 ११ सितंबर, १८९३ का दिन उस संन्यासी के जीवन में विशेष महत्त्व का दिन था। जब शिकागो के सर्व धर्म सम्मेलन में उनका भाषण हुआ, हजारों श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। अब प्रत्येक अमेरिका निवासी को जुबान पर उन्हीं का नाम था। यह वह व्यक्ति था जो कभी रात काटने के लिए दर-बदर भटकता रहा और आज लोगों के हृदय में अपना स्थान बनाए हुए था।


 अनेक समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर उनके भाषण 1. छपने लगे। नगर में स्थान-स्थान पर अनेक बड़े-बड़े चित्र लगाए गए, जिसके नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था-'स्वामी विवेकानंद। सचमुच भारतीय धर्म और दर्शन की ध्वजा को देश की सीमा से पार कर सुदूर देशों तक पहुँचाने वाले स्वामी विवेकानंद की सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता। 



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